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ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा क्या है?

 ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा

वस्तुनिष्ठा आधुनिक वैज्ञानिक विधा की विशेषता है। इसका अभिप्राय यह है कि ‘‘यदि कोई वैज्ञानिक समुचित विधि तथा नियमों के आधार पर प्रयोगशाला में सिद्ध निष्कर्ष को प्रस्तुत करता है तो सभी वैज्ञानिक उस गवेषणा को स्वीकार कर लेंगे, जैसे लोहा, पानी, पारा आदि के सम्बन्ध में निष्कर्ष सार्वभौमिक तथा सर्वकालीन हैं। इन वस्तुओं से सम्बन्धित निष्कर्ष के विषय में विभिन्न मत नहीं हो सकते।’’

अधिकांश इतिहासकारों ने इतिहास को विज्ञान स्वीकार किया है। इन इतिहासकारों के अनुसार इतिहास में वस्तुनिष्ठा पाई जाती है, परन्तु जो विद्वान ऐसा नहीं मानते हैं, उनके अनुसार इतिहास में वस्तुनिष्ठा नहीं होती। इतिहास को वैज्ञानिक विषय के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले इतिहासकार इस बात पर बल दे रहे हैं कि इतिहास को पूर्णतया विज्ञान स्वीकार कर लिया जाए। यदि ऐसा होता है तो उसमें वस्तुनिष्ठा अपेक्षित होगी।

परन्तु वैज्ञानिक विधा में आस्था रखने वाले इतिहासकारों के प्रयास के बावजूद ऐतिहासिक निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ नहीं बन सका है, क्योंकि इतिहास मानवीय उपलब्धियों का विवरण है। मानवीय क्रिया-कलापों के सम्बन्ध में सभी का एकमत होना सम्भव नहीं है, इसलिए ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की समस्या आज भी विवाद का विषय बनी हुई है।

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Aitihasik-vastunishtha


ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की समस्याएँ

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

(1) इतिहासकारों द्वारा सामाजिक आवश्यकता के अनुसार इतिहास की रचना करना- जे.ए. राबिन्सन का कथन है कि आधुनिक इतिहासकार अपने पूर्ववर्ती इतिहासकारों द्वारा संकलित ऐतिहासिक सामग्री का प्रयोग अपने युग की आवश्यकताओं के अनुसार करते हैं। इस प्रकार इतिहास की पुनर्रचना प्रत्येक युग की सामाजिक आवश्यकता के अनुसार होती है।

एडवर्ड मेयार ने इतिहास लेखन में समसामयिक सामाजिक आवश्यकता को प्रधान माना है।

क्रोचे ने लिखा है कि मनुष्य की आत्मा अपने युग के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए।

गार्डिनर के अनुसार सामाजिक आवश्यकता का कोई मापदण्ड नहीं है। एक ही ऐतिहासिक तथ्य की उपयोगिता तथा अनुपयोगिता विभिन्न युगों में बदलती रहती है। उपनिवेशवाद तथा दास प्रथा किसी युग की सामाजिक आवश्यकता रही होगी, परन्तु वर्तमान में उन्हें सामाजिक अभिशाप माना गया है।

इस प्रकार एक युग का इतिहास दूसरे युग से भिन्न होता है और इतिहास में यह विभिन्नता अवश्यम्भावी है। इटली तथा जर्मनी का एकीकरण राष्ट्रवाद का ही परिणाम था परन्तु बीसवीं सदी में उग्र राष्ट्रवाद प्रथम विश्वयुद्ध तथा द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण बना। अत: युग की सामाजिक आवश्यकता इतिहासकारों के दृष्टिकोण को सदैव प्रभावित करती रही है।

(2) इतिहास में वस्तुनिष्ठा का समावेश यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है- इतिहास में वस्तुनिष्ठा का समावेश यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। बियर्ड का कथन है कि ऐतिहासिक तथ्यों के चयन में इतिहासकार व्यक्तिगत रुचि, द्वेष, भ्रान्ति, सामाजिक वातावरण तथा आर्थिक परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होता है। उसके द्वारा ऐतिहासिक नियम तथा विधाओं की उपेक्षा स्वाभाविक है। ऐसी परिस्थिति में इतिहासकार से वस्तुनिष्ठा की अपेक्षा करना उचित नहीं है।

कार्ल बेकर ने लिखा है कि इतिहास की पुनर्रचना प्रत्येक मनुष्य की आन्तरिक भावनाओं के अनुकूल की जाती है। औरंगजेब के सम्बन्ध में सर यदुनाथ सरकार तथा फारुकी की रचनाएँ व्यक्तिगत भावनाओं से प्रभावित हैं। इसलिए इनमें ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा की गई है। जब इतिहासकार अपनी भावनाओं के अनुकूल तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने का प्रयास करता है, तो इतिहास में वस्तुनिष्ठा का समावेश कठिन है।

(3) किंवदन्तियों का अमान्य होना- इतिहास में किंवदन्तियाँ किसी युग में प्रामाणिक तथा मान्य थीं, किन्तु आज वे मानव-इतिहास में अमान्य हो गई हैं। उसी प्रकार वर्तमानकालिक ऐतिहासिक प्रामाणिकता तथा मान्य तथ्य भविष्य में उपेक्षित हो जायेंगे। ऐसी परिस्थिति में ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा की तुलना में सार्वभौमिक तथा सर्वयुगीन नहीं हो सकती। 2 +2 =4 सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक तथ्य है। विशेष परिस्थिति में सूर्य ग्रहण तथा चन्द्रग्रहण होता है। अत: वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा की चुनौती नहीं दी जा सकती। परन्तु ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा का स्वरूप सार्वभौमिक तथा सर्वयुगीन नहीं हो सकता।

(4) इतिहासकार द्वारा अपने युग की आवश्यकतानुसार इतिहास लिखना-  कार्ल बेकर के अनुसार इतिहास अतीतकालीन घटनाओं का सर्वांगीण विवरण है, परन्तु अतीत की घटनाओं का वर्णन प्रत्येक युग का इतिहासकार समान रूप से प्रस्तुत नहीं करता। प्रत्येक पीढ़ी का इतिहासकार अपने युग की आवश्यकतानुसार इतिहास लिखता है। दास-प्रथा किसी युग की सामाजिक आवश्यकता थी, परन्तु वर्तमान में वह सामाजिक अभिशाप हो गई है। इतिहास का स्वरूप प्रत्येक युग में परिवर्तनशील रहा है। अत: इतिहास में वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा की कल्पना करना एक स्वप्न है।

(5) इतिहासकारों पर सामाजिक वातावरण तथा संस्कारों का प्रभाव- कार्ल मार्क्स के अनुसार मनुष्य सामाजिक प्राणी है तथा संस्कारों से जुड़ा हुआ है। इतिहासकार पर भी समाज, धर्म तथा संस्कार का प्रभाव पड़ता है। अतः कोई भी इतिहासकार अपने को इन प्रभावों से मुक्त नहीं कर पाता है। कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि वैज्ञानिक विधा में आस्था रखने वाले इतिहासकारों को समाज के बाहर ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा ढूँढनी चाहिए। मार्क्स का कथन सही प्रतीत होता है। संस्कारों तथा सामाजिक वातावरण के कारण ही अरब-यहूदी, हिन्दू-मुस्लिम तथा रूसी-अमेरिकी इतिहासकारों में मतभेद है।

(6) इतिहासकारों द्वारा बाह्य विधाओं द्वारा इतिहास के स्वरूप को वस्तुनिष्ठ बनाना- डोर्डल ने लिखा है कि कोई भी पदार्थ स्वयमेव वस्तुनिष्ठ नहीं होता। विषय से अलग करके ही वस्तुनिष्ठा प्रतिरोपित की जाती है। आधुनिक इतिहासकार भ्रान्ति एवं द्वेषमूलक वस्तुनिष्ठा को भी यथार्थ देखते हैं और वे बाह्य विधाओं द्वारा इतिहास के स्वरूप को वस्तुनिष्ठ बनाने का प्रयास करते हैं। परिणामस्वरूप ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा दार्शनिकों तथा इतिहासकारों के बीच गम्भीर चर्चा तथा विवाद का विषय बन जाता है। इतिहासकार अतीत का चित्रण किसी विशेष दृष्टिकोण, अवधारणा, संस्कार, व्यक्तिगत ईर्ष्या, द्वेष तथा भ्रान्ति के परिवेश में प्रस्तुत करता है। यदि इसे यथार्थ मान लिया जाए तो इतिहासकार का निष्कर्ष निष्पक्ष नहीं हो सकता। कार्ल मार्क्स, स्पेंगलर आदि ने विशेष दृष्टिकोण से अतीतकालीन घटनाओं की व्याख्या की है।

प्रो. वाल्श ने तो स्पष्ट लिखा है कि इतिहास का अध्ययन दृष्टि विशेष से करना चाहिए। अत: यदि इतिहास- अध्ययन में दृष्टि विशेष की प्रधानता दी जायेगी, तो ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की कल्पना व्यर्थ है।

(7) रचनाएँ लेखक के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती हैं- रचनाएँ लेखक के व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति होती हैं । इतिहासकार की रचना भाव-प्रधान होती है, तर्क-प्रधान नहीं। रांके के अनुसार इतिहास-लेखन अन्तश्चेतना का विषय है। अन्तश्चेतना का भाव प्रधान होना स्वाभाविक है। इतिहास में तर्क तथा विवेक का स्थान नहीं है। अत: व्यक्तिगत भावनाओं को इतिहास-लेखन से अलग कर वस्तुनिष्ठ बनाना एक असम्भव प्रयास होगा। इतिहासकार कितना ही निष्पक्ष क्यों न हो, वह पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता उसकी रचना में समय की अभिव्यक्ति अपने आप होती रहती है। समसामयिक संस्कृतियाँ उसके दृष्टिकोण को निर्धारित करती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इतिहासकार की रचना को समसामयिक समाज, संस्कृति तथा वातावरण प्रभावित करते हैं। इतिहासकार भी परिस्थितियों की उपज होते हैं। साहित्यकार की भाँति इतिहासकार का भी व्यक्तित्व उसकी रचनाओं में सजीव रहता है। उसके व्यक्तिगत विचार तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति उसकी रचनाओं में होती है। वस्तुनिष्ठ के नाम पर इन्हें छिपाने का प्रयास मूर्खतापूर्ण होगा। हाल्फेन ने तो इतिहास-लेखन में पक्षपात की उपादेयता को स्वीकार किया है। बदायूँनी ने पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए अकबर की नीतियों एवं कार्यों की आलोचना की है।

(8) इतिहासकार में द्वेष तथा सहानुभूति का होना स्वाभाविक है- जी.एम. ट्रेवेलियन ने भी कहा है कि इतिहासकार में द्वेष तथा सहानुभूति का होना स्वाभाविक है। वह अपनी तथा सामाजिक रुचि के सन्दर्भ में अतीत के व्यक्तियों, उनके कार्यों और उपलब्धियों का वर्णन करता है। इस प्रकार उसका प्रस्तुतीकरण विषयनिष्ठ होता है। उसके वस्तुनिष्ठ होने की आशा एक भूल है।

वेबर के अनुसार वस्तुनिष्ठा एक दोष है, क्योंकि इतिहास में इस उद्देश्य की प्राप्ति अत्यन्त जटिल है। ओकशाट के अनुसार इतिहासकार का पूर्वाग्रही होना स्वाभाविक है। उदाहरणार्थ, साम्राज्यवादी ब्रिटिश इतिहासकारों ने 1857 के विद्रोह को सैनिक विद्रोह कहा है, जबकि भारतीय इतिहासकार उसे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की संज्ञा देते हैं।

एल्टन का मत है कि इतिहास की चयन प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ इतिहास का बाधक तत्त्व होता है। इतिहासकार कितना ही निष्पक्ष क्यों न हो, विषय का चयन उसके ही द्वारा होता है। इतिहास के प्रस्तुतीकरण में जब इतिहासकार के सर्वांगीण व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति होती है, तब ऐसी परिस्थिति में इतिहासकार का स्वरूप वस्तुनिष्ठ कैसे हो सकता है?

(9) इतिहास का स्वरूप चयनात्मक होता है- वाल्श के अनुसार इतिहास का स्वरूप चयनात्मक होता है। किसी भी इतिहासकार के लिए अतीत का सर्वांगीण चित्रण कठिन है। प्रायः इतिहासकार अतीत के किसी एक पक्ष का ही वर्णन करता है अतीत का विस्तृत क्षेत्र इतिहासकार को किसी एक पक्ष के इच्छानुसार चयन करने के लिए विवश करता है। इस प्रकार का चयन इतिहासकार को पूर्वाग्राही बना देता है पूर्वाग्राही विचार के कारण एक ही घटना को इतिहासकार अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

डॉ.ईश्वरी प्रसाद के अनुसार गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु उलुगखाँ के सुनियोजित षड्यन्त्र का परिणाम थी जबकि डॉ. मेहंदी हुसैन ने उलुगखाँ को निर्दोष बताते हुए कहा है कि अचानक बिजली गिरने के कारण गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु हुई थी। दोनों इतिहासकारों के विचारों में मतभेद का कारण उनके पूर्वाग्राही विचार हैं। पूर्वाग्राही विचार के कारण दोनों इतिहासकारों ने अपने तर्क के समर्थन में तथ्यों का चयन किया है। इतिहास में इस प्रकार का चयन ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए बाधक है।

(10) धर्म तथा जाति द्वारा ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में कठिनाई उत्पन्न करना- धर्म तथा जाति भी ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में कठिनाई उत्पन्न करते हैं। इतिहासकार अपने को धार्मिक तथा जातिगत आग्रहों से मुक्त नहीं कर पाते।मध्ययुगीन भारतीय इतिहास के इतिहासकारों ने धर्म तथा जातिगत भावनाओं से प्रभावित होकर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सर यदुनाथ सरकार ने औरंगजेब की धार्मिक नीति तथा मन्दिरों को ध्वस्त करने की कटु आलोचना की है, परन्तु फारुकी ने औरंगजेब की धार्मिक नीति तथा मन्दिरों के ध्वस्त करने के कार्य को न्यायोचित बताया है। अत: इतिहास में वस्तुनिष्ठा की स्थापना करना कठिन है।

(11) इतिहास के कुछ विषय वैज्ञानिक हो सकते हैं, सभी नहीं- इतिहासकार का वस्तुनिष्ठ होना कठिन है। गार्डिनर का कथन है कि इतिहास का सम्पूर्ण स्वरूप वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता । इतिहास के कुछ विषय वैज्ञानिक हो सकते हैं, जैसे आर्थिक इतिहास। इनमें वस्तुनिष्ठा हो सकती है। परन्तु अन्य सामान्य घटना-प्रधान अंशों में वैज्ञानिकता का अभाव होता है, अतएव उनमें वस्तुनिष्ठा को आरोपित करना एक समस्या बन जायेगी। गार्डिनर के अनुसार यदि विवादमुक्त होने के कारण विज्ञान वस्तुनिष्ठ है, तो तुलनात्मक अध्ययन के कारण इतिहास विषयनिष्ठ है।

(12) ऐतिहासिक न्याय मूल्यपरक होता है- मैंडेलबाम के अनुसार ऐतिहासिक न्याय मूल्यपरक होता है। अत: इसे वस्तुनिष्ठ स्वीकार करना सम्भव नहीं है। इतिहासकार सांस्कृतिक तथा व्यक्तिगत दृष्टिकोण से इतिहास की व्याख्या करता है। सामाजिक मूल्यों का स्वरूप स्थायी तथा स्थिर न होकर प्रत्येक युग में बदलता रहता है। परिवर्तित सामाजिक मूल्यों का प्रभाव इतिहासकार के दृष्टिकोण पर पड़ता है। यदि क्रोचे, डिल्थे तथा मेनहीम के विचारों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो उनका इतिहास मूल्यपरक दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त उपयोगितावादी दृष्टिकोण भी इतिहासकार के व्यक्तिगत दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। इन कारणों से ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा एक जटिल समस्या बनी हुई है।

(13) इतिहासकारों का राजनीतिक दलों के सिद्धान्तों से प्रभावित होना- सभ्य समाज में रहने वाले मनुष्यों का सम्बन्ध राजनीतिक दलों से रहता है, जैसे-मार्क्सवादी, लिबरल्स, पूँजीवादी, प्रजातन्त्रवादी, राजतन्त्रवादी, साम्यवादी आदि । इतिहासकार भी इन राजनीतिक दलों के सिद्धान्तों से प्रभावित होते हैं। वे अपनी दृष्टि से ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या करते हैं। ऐसे इतिहासकारों से वस्तुनिष्ठा की अपेक्षा करना उचित नहीं प्रतीत होता। वे यथार्थ तथ्य को अपनी दृष्टि से देखते तथा व्याख्या करते हैं। ऐसे इतिहासकारों की रचनाओं में ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा का सर्वत्र अभाव दिखाई देता है।

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की आवश्यकता

आज इतिहास में वस्तुनिष्ठा परम आवश्यक मानी जा रही है क्योंकि इतिहास को भी एक विज्ञान की श्रेणी प्रदान करने का प्रयास तेजी से चल रहा है और इतिहास का अध्ययन पूर्णत: वैज्ञानिक करने का भी यत्न किया जा रहा है। इतिहास में तथ्या-तथ्य होना एक आवश्यक दायित्व है, परन्तु गुण नहीं। फिर भी वस्तुनिष्ठ व्याख्या इतिहासकार का दायित्व होना चाहिए, क्योंकि उसका उद्देश्य सम्पूर्ण समाज के लिए इतिहास लिखना है जिसका स्वरूप वैज्ञानिक होना आवश्यक है।

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा का कोई सिद्धान्त नहीं है, इसके लिए केवल अभ्यास तथा प्रयास करने की आवश्यकता है और यह इतिहासकार के मानसिक चिन्तन पर निर्भर करता है। इस वस्तुनिष्ठा के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की आवश्यकता को सिद्ध करने के लिए कुछ निम्नलिखित प्रश्न विचारणीय हैं-

1. एक इतिहासकार से किस प्रकार की वस्तुनिष्ठा अपेक्षित है?

2. क्या इतिहास में विषयनिष्ठा तथा वस्तुनिष्ठा की गवेषणा आवश्यक है?

3. क्यों इतिहासकार तथा दार्शनिक ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा को एक समस्या के रूप में देखते हैं?

4. क्या हम इस तथ्य को स्वीकार कर सकते हैं कि इतिहास विज्ञान की भाँति वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता?

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की आवश्यकता को सिद्ध करने के लिए उपर्युक्त मूलभूत प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर आवश्यक प्रतीत होता है-

(1) व्यक्तित्व को इतिहास से पृथक रखना- इतिहास महापुरुषों के कार्यों एवं उपलब्धियों की कहानी है। ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए आवश्यक है कि उनके कार्यों का अध्ययन यथार्थ रूप में किया जाए। इतिहासकार को अत्यधिक प्रशंसा तथा द्वेष की भावना से प्रभावित नहीं होना चाहिये। डिल्थे ने लिखा है कि वस्तुनिष्ठ इतिहास का आधार मानव-स्वभाव का वस्तुनिष्ठ अध्ययन होना चाहिए। अतः इतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वस्तुनिष्ठ भाव से अतीत के महापुरुषों के कार्यों एवं उपलब्धियों का वर्णन करे।

रेनियर के अनुसार रचनाएँ व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती हैं, परन्तु व्यक्तित्व से इतिहास को दूषित नहीं करना चाहिए। वस्तुनिष्ठा में आस्था रखने वाले इतिहासकारों को इस बात का ध्यान देना चाहिए कि इतिहास तथ्य प्रधान है, व्यक्तित्व प्रधान नहीं। यही कारण है कि रैटजेल, हेलमोल्ट, कोलोज आदि ने एक स्वर से कहा है कि व्यक्तित्व को इतिहास-क्षेत्र से बाहर रखना चाहिए। अतः स्पष्ट है कि व्यक्तित्व को इतिहास से पृथक् कर ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के महत्त्व को सुरक्षित रखा जा सकता है।

(2) तथ्यों का आदर करना- इतिहासकार द्वारा तथ्यों के चयन की आवश्यकता नहीं है। एक तथ्य स्वयं दूसरे तथ्य के चयन का मार्ग प्रशस्त करता है और इतिहासकार को उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है । इतिहासकार अपनी रुचि के अनुसार तथ्यों के चयन के लिए स्वतन्त्र नहीं है । ऐतिहासिक तथ्यों का स्वरूप वस्तुनिष्ठ होता है। इतिहासकार का पुनीत कर्त्तव्य वस्तुनिष्ठा का निर्वाह करते हुए तथ्यों का आदर करना है। इतिहास-अध्ययन में मनोनुकूल रुचियों को प्राथमिकता देकर वस्तुनिष्ठा की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। वस्तुनिष्ठा का अभिप्राय यथार्थता का सम्मान करना है। इतिहासकार को रहस्यवाद की उलझनों में न फँसकर, ऐतिहासिक स्रोतों में वर्णित तथ्यों को ही यथार्थ मानकर अतीत का उपयोगी चित्रण प्रस्तुत करने का प्रयास करना चाहिए।

(3) इतिहासकार को धार्मिक प्रभावों तथा नैतिक अधिकारों से अप्रभावित रहना चाहिए- इतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वह अपने को धार्मिक प्रभावों से मुक्त रखे। इतिहासकार समाज का प्रतिनिधि होता है। उसे सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, कि धर्म-प्रभावित समाज के एक छोटे वर्ग का। सम्पूर्ण समाज का नेतृत्व करके ही इतिहासकार ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा को सुरक्षित रख सकता है। इसी प्रकार घटना अथवा व्यक्ति के सम्बन्ध में नैतिक न्याय देना इतिहासकार का कार्य नहीं है। नैतिक न्याय के अधिकार को प्राप्त कर वह 15वीं सदी का पोप तथा निरंकुश शासक बन जायेगा। बटरफील्ड ने ठीक ही कहा है कि इतिहासकार न्यायाधीश नहीं, अपितु समाजसेवकों का सेवक है। इतिहासकार अपनी इस अवधारणा से ही इतिहास को वस्तुनिष्ठ बना सकता है। उसका प्रमुख उत्तरदायित्व अतीत के तथ्यों का सूक्ष्म विवेचन करना तथा भविष्य का मार्गदर्शन करना है। इतिहासकार को नैतिक अधिकारों का परित्याग कर देना चाहिए। इस प्रकार ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा का प्रयास सार्वभौमिक है।

(4) ऐतिहासिक व्याख्या पर अनेक सिद्धान्तों तथा दृष्टिकोणों का प्रभाव- ऐतिहासिक व्याख्या पर अनेक सिद्धान्तों एवं दृष्टिकोणों का प्रभाव पड़ा है। साम्यवाद, पूँजीवाद, राष्ट्रवाद, प्रजातन्त्रवाद, साम्राज्यवाद, मार्क्सवाद आदि सिद्धान्तों ने ऐतिहासिक व्याख्या तथा विश्लेषण को सर्वाधिक प्रभावित किया है। इतिहासकारों में सैद्धान्तिक मतभेद होना स्वाभाविक है। अनेक इतिहासकार एक ही तथ्य को अपने-अपने दृष्टिकोणों से देखते हैं । एकेश्वर यथार्थ तथ्य है। सभी धर्मावलम्बी अपने-अपने ढंग से उस एकेश्वर को देखते हैं। इसी प्रकार इतिहास के विभिन्न सिद्धान्तों द्वारा एक ही ऐतिहासिक तथ्य को अनेक दृष्टियों से देखा जाता है। वाल्श ने विभिन्न सिद्धान्तों को ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में बाधक नहीं, अपितु सहायक स्वीकार किया है। सभी सिद्धान्तों का मूल उद्देश्य अपने-अपने ढंग से ऐतिहासिक यथार्थता का अन्वेषण करना है।

(5) सामान्य इतिहास तथा शोध इतिहास का अन्तर- बटरफील्ड के अनुसार इतिहास में वस्तुनिष्ठा के समावेश के पहले सामान्य इतिहास तथा शोध इतिहास के अन्तर को समझना चाहिए। सामान्य इतिहास संक्षिप्त होता है तथा शोध इतिहास वृहद् इतिहास होता है। इतिहासकार अपनी व्यक्तिगत धारणाओं तथा भावनाओं से संक्षिप्त इतिहास को अलंकृत नहीं कर सकता। अत: सामान्य इतिहास वस्तुनिष्ठ हो सकता है, परन्तु शोध इतिहास में वस्तुनिष्ठा का अभाव दिखाई देता है। क्योंकि शोध इतिहास में इतिहासकार मनोनुककूल तथ्यों का चयन कर व्यक्तिगत एवं सामाजिक रुचि के अनुसार उनकी व्याख्या करता है।

मैंडेलबाम ने भी इस तर्क का समर्थन करते हुए लिखा है कि इतिहास में चयन, वैयक्तिकता, सम्पूर्णता तथा निहित अर्थों का समावेश इतिहासकार द्वारा किया जाता है। ऐतिहासिक प्रस्तुतीकरण में वस्तुनिष्ठा का प्रतिष्ठापन इतिहासकार की व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर करता है। अतः इतिहास में वस्तुनिष्ठा के समावेश के लिए इतिहासकार की व्यक्तिगत योग्यता पूर्णतया अपेक्षित है।

(6) ऐतिहासिक तथ्य वस्तुनिष्ठ इतिहास के आधार हैं- ऐतिहासिक तथ्य वस्तुनिष्ठ इतिहास के आधार हैं। बटरफील्ड ने लिखा है कि "वस्तुनिष्ठता इतिहास की वाणी है।" इतिहास में इतिहासकार के व्यक्तिगत दृष्टिकोण के अतिरिक्त कुछ अन्य बातों का उल्लेख भी आवश्यक है। उन्हें इतिहास का न्याय कहते हैं। निर्वैयक्तिक रूप से विचारणीय इतिहास मनुष्य को कुछ विशेष तथ्यों से अवगत कराता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इतिहास व्यक्तित्व प्रधान न होकर तथ्य प्रधान होता है। वर्तमान समाज इतिहासकारों से तथ्य प्रधान विवरण की अपेक्षा करता है। तथ्य को प्रधानता देकर ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की रक्षा की जा सकती है।

जी.एन. क्लार्क ने लिखा है कि यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास की वस्तु सामग्री तथ्य होते हैं। विवाद के आवरण में छिपे हुए तथ्य ही अतीत सम्बन्धी ज्ञान के आधार हैं । एक्टन के अनुसार तथ्य स्वयमेव वस्तुनिष्ठ होता है। अतः ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए यथार्थ तथ्यों का प्रस्तुतीकरण आवश्यक है।

ओकशाट के अनुसार इतिहासकार तथ्य से नहीं, अपितु व्याख्या से अपना विवरण आरम्भ करता है। वैसे इतिहास में व्याख्या की अपेक्षा तथ्य प्रधान होते हैं । वस्तुनिष्ठा के लिए निष्पक्षता एवं मतैक्यता का होना भी आवश्यक है। वाल्श ने लिखा है कि एक घटना के प्रस्तुतीकरण में यदि इतिहासकार अतीत का सम्पूर्ण यथार्थ चित्रण नहीं प्रस्तुत कर सकता है तो उसे कम से कम यथार्थ तथ्यों का ही वर्णन करना चाहिए। यही यथार्थता इतिहास की वस्तुनिष्ठा है।

(7) व्यक्तिगत तत्त्वों को इतिहास-प्रक्रिया से अलग करना- डेवी के अनुसार बौद्धिक वस्तुनिष्ठा का तात्पर्य व्यक्तिगत तत्त्वों को इतिहास-प्रक्रिया से अलग करना है जिसके माध्यम से निष्कर्ष प्राप्त होता है। वाल्श ने लिखा है कि स्थान तथा व्यक्तियों के प्रति उदासीनता द्वारा इतिहास में वस्तुनिष्ठा का समावेश सम्भव है। गार्डिनर के अनुसार इतिहासकार को वस्तुनिष्ठा का परित्याग करके अपनी व्यक्तिगत रुचि के अनुसार इतिहास को अतिरंजित नहीं करना चाहिए। ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा इतिहासकार की व्याख्या में निहित होती है। व्याख्या-प्रधान का तात्पर्य यथार्थ तथ्यों पर आधारित घटना का प्रस्तुतीकरण है। इतिहास व्यक्तिगत विचारों के प्रचार का साधन नहीं है।

(8) ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में दार्शनिक मतभेद भी बाधक हैं- ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में दार्शनिक मतभेद को भी बाधक माना गया है। इतिहास की विषयवस्तु अतीतकालीन मानव का कार्य-व्यापार है। वाल्श का कथन है कि कार्य व्यापार सम्बन्धी तथ्यों का अध्ययन किसी विशेष दृष्टिकोण से नहीं, अपितु निष्पक्ष होकर वस्तुनिष्ठ भाव से करना चाहिए, अन्यथा इतिहास के दूषित होने की सम्भावना हो सकती है। कार्ल मार्क्स ने कहा है कि मानव चिन्तन में वस्तुनिष्ठ यथार्थता का प्रश्न सैद्धान्तिक नहीं, अपितु व्यावहारिक है। इसका तात्पर्य है कि ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए सिद्धान्त की अपेक्षा अभ्यास की आवश्यकता है।

(9) ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए पुनर्मनन आवश्यक है- ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए पुनर्मनन आवश्यक है। इससे इतिहास में वस्तुनिष्ठा का समावेश सरल हो जाता है। ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा उस समय अत्यधिक सरल हो सकती है जब विभिन्न सिद्धान्तों, अवधारणाओं तथा दृष्टिकोणों को सावभौमिक मान्यता प्रदान की जाए। इतिहासकार अतीतकालीन मानव- कार्य-व्यापार का पुनर्मनन करता है । वह पुनर्मनन की प्रक्रिया द्वारा विषयनिष्ठ तथ्य को वस्तुनिष्ठ बनाने में सक्षम है। पुनर्मनन एक प्रकार की मानसिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के द्वारा यह विषयनिष्ठ यथार्थता को वस्तुनिष्ठ बना सकता है। ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए पुनर्मनन एक आवश्यक साधन है।

(10) इतिहासकार को अनुशासन तथा नियम का पालन करना चाहिए- इतिहासकार को अनुशासन तथा नियम का पालन करना चाहिए। ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा इतिहास-अनुशासन का अंग है तथा निष्पक्षता इतिहास की आवश्यकता है। अनुशासित इतिहासकारों को ही इतिहास लिखना चाहिए।जी.पी. गूच ने लिखा है कि अतीतकालिक जीवन तथा आदर्शों को समझाने के लिए हमें निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए क्योंकि अतीतकालिक जीवन तथा आदर्श से हमारा सम्बन्ध नहीं है। इतिहास के वांछनीय नियमों की उपेक्षा करने से इतिहास का स्वरूप दूषित हो सकता है। अत: इतिहासीय-अनुशासन में ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा आवश्यक है।

(11) ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की अवधारणा वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा से भिन्न है- ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा की अवधारणा वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा से भिन्न है । ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में आस्था रखने वाले इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं कि इतिहास की रचना में इतिहासकार के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति एक कलाकार की भाँति होती है। कलाकार अपने कलात्मक प्रस्तुतीकरण के माध्यम से अपनी कल्पना अथवा अन्तर्दृष्टि को दर्शकों तक पहुँचाने का प्रयास करता है। उसका प्रयास संकेत करता है कि प्रस्तुत चित्र यथार्थ तथा वस्तुनिष्ठ है । यथार्थ में विश्वास को ही वह वस्तुनिष्ठ मानता है। एक इतिहासकार को ऐतिहासिक चिन्तन का प्रस्तुतीकरण कलाकार की भाँति करना चाहिए। इतिहासकार अपने दृष्टिकोण से अतीत का वर्णन करता है, उसका विश्वास अपने वर्णन की वस्तुनिष्ठ-यथार्थता में रहता है। अन्य व्यक्तियों द्वारा इस यथार्थता की मान्यता का तात्पर्य ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा को स्वीकार करना है।

इतिहास में वस्तुनिष्ठा नहीं होती, परन्तु होती भी है-

आज का युग विज्ञान का युग है। आज के बौद्धिक एवं तार्किक युग में किसी भी बात को यों ही आँख बन्द कर स्वीकार नहीं किया जाता, अपितु उपलब्ध प्रमाणों एवं साक्ष्यों के आधार पर उसकी सत्यता की जाँच की जाती है तथा सत्य होने पर ही स्वीकार किया जाता है। यह स्वीकृति सार्वभौम तब होती है जब वह सत्य बार-बार परीक्षण के बाद भी सत्य ही सिद्ध होता है और ऐसा केवल विशुद्ध विज्ञान में ही होता है। इतिहास विशुद्ध विज्ञान नहीं है। उसका स्वरूप विषयनिष्ठ होता है। इतिहास लेखक की भावनाओं तथा उसके व्यक्तित्व से ओत-प्रोत होता है। इसलिए इतिहासकार का निष्कर्ष सार्वभौम नहीं होता। अतः सभी इतिहासकार उसके निर्णयों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। इसके अतिरिक्त एक व्यक्ति की उपलब्धियों को सभी लोग विभिन्न दृष्टिकोणों से देखते हैं । अतएव स्वाभाविक है कि इतिहास में वस्तुनिष्ठा नहीं होती।

परन्तु आधुनिक इतिहासकारों का यह मानना है कि इतिहास भी एक विज्ञान है और उसमें वस्तुनिष्ठा होती है। काम्टे का यह कहना है कि जब इतिहासकार व्यक्तिगत भाव का परित्याग करके सिद्धान्त का आश्रय लेता है, तो इतिहास का विषयनिष्ठ स्वरूप वस्तुनिष्ठा में परिवर्तित हो जाता है। उसका यह भी कहना है कि इतिहास-क्षेत्र में अर्थशास्त्र, मुद्राशास्त्र, अभिलेख, पुरातात्विक रसायन शास्त्र आदि का प्रयोग इतिहास में किया जा रहा है जिससे उसका स्वरूप वस्तुनिष्ठात्मक होकर वैज्ञानिक स्वरूप ग्रहण कर रहा है और आज इतिहास चिन्तन और वैज्ञानिक चिन्तन में समानता भी दिखने लगी है। इसलिए इतिहास को विज्ञान न मानना भूल होगी तथा उसमें वस्तुनिष्ठा को न मानना भी बड़ी भूल होगी।

इतिहास में वस्तुनिष्ठा की समीक्षा

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा एक जटिल समस्या है, परन्तु इतिहासकारों ने इसका समाधान भी प्रस्तुत किया है। इतिहास में हम मानव-मस्तिष्क तथा उससे उत्प्रेरित कार्यों का अध्ययन करते हैं। मनुष्य स्वयं अध्ययन का एक जटिल विषय है। वैज्ञानिक सामान्य का तथा इतिहासकार विशेष का अध्ययन करता है। वैज्ञानिक विधा में आस्था रखने वाले इतिहासकारों ने भी इतिहास में वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा का अनुमोदन नहीं किया है।

डेविड थामसन के अनुसार इतिहास न तो वाल्तेरियन दृष्टिकोण की प्रगाढ़ विषयनिष्ठा और न गणित को निर्वैयक्तक निश्चयात्मक वस्तुनिष्ठा को प्रस्तुत करता है। इस प्रकार इतिहास में न तो प्रगाढ़ विषयनिष्ठा है और न निर्वैयक्तिक निश्चयात्मक वस्तुनिष्ठा।

वाल्श के अनुसार इतिहास में दो प्रमुख तत्त्व होते हैं- इतिहासकार द्वारा प्रदत्त विषयनिष्ठ तत्त्व तथा साक्ष्य। इतिहासकार साक्ष्यों को प्रधानता देकर इतिहास को वस्तुनिष्ठ बना सकता है क्योंकि इतिहासकार का प्रत्येक वाक्य साक्ष्यों पर आधारित रहता है। ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा इतिहासकार की योग्यता में निहित है। वह किसी प्रकार घटना के अभिनेता तथा ऐतिहासिक घटना के सम्बन्ध को प्रस्तुत करता है। इतिहासकार की योग्यता का विकास सिद्धान्त द्वारा नहीं, अपितु अभ्यास द्वारा सम्भव है। वाल्श का कथन है कि वस्तुनिष्ठ ऐतिहासिक अन्तश्चेतना इतिहास में एक बुद्धिवादी विचारधारा का ढाँचा प्रदान करेगी। अतः यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक अन्तश्चेतना से ही बुद्धिवादी विचारधारा का विकास होता है जो ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा में सहायक सिद्ध होती है।

रेनियर के अनुसार इतिहास-लेखन की आचार-संहिता इतिहास में निहित रहती है, इतिहासकार में नहीं। जो लोग इतिहास-लेखन का कार्य करते हैं, उन्हें नियमों तथा अनुशासन को भी स्वीकार करना चाहिए। बौद्धिक निष्ठा के अभाव में इतिहास अपने वास्तविक स्वरूप को खोकर उपन्यास अथवा काल्पनिक रचना बन जाता है। इतिहास के नियम तथा अनुशासन इतिहासकार को ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा के लिए सदैव प्रेरित करते रहे हैं। सर चार्ल्स ओमन के अनुसार यह सत्य है कि इतिहास-रचना लेखक के व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करती है। इतिहासकार अपनी रचना को निर्वैयक्तिक बनाने का प्रयास करते हुए भी कुछ कठोर तथ्यों को अस्वीकार नहीं कर सकता। इतिहास में तथ्य को प्रधानता देकर ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा सुरक्षित रखी जा सकती है।

इतिहास में वस्तुनिष्ठता की प्रकृति की विवेचना निम्नलिखित आधार पर की जा सकती है-

1. गणित एवं भौतिकी की भाँति इतिहास में वस्तुनिष्ठता नहीं है, क्योंकि वस्तुनिष्ठ ज्ञान सदैव एक प्रकार का होता है। वस्तुनिष्ठ ज्ञान पर स्थान, काल आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

2. इतिहासकार की व्यक्तिवादी छाप उसके इतिहास पर पड़ती है।

3. इतिहास में मतैक्य नहीं है। अतः ऐतिहासिक विवरण सर्वमान्य नहीं होते जबकि वस्तुनिष्ठ ज्ञान में एकरूपता होती है।

4. ऐतिहासिक विवरण ऐतिहासिक तत्त्वों या पात्रों या उसकी भिन्नता से प्रभावित होते है।

5. ऐतिहासिक निर्णय स्वतः नहीं निकल आता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास में पूर्ण वस्तुनिष्ठा नहीं है। इतिहास पूर्णरूपेण व्यक्तिनिष्ठ ज्ञान नहीं है। अत: इतिहास की व्याख्या वस्तुनिष्ठा तथा व्यक्तिनिष्ठा के बीच की जा सकती है। विज्ञान वस्तुनिष्ठ ज्ञान होता है परन्तु विज्ञान की प्रत्येक शाखा में भी समान वस्तुनिष्ठा नहीं होती। यदि जियोलोजी आदि को वस्तुनिष्ठ ज्ञान कह सकते हैं तो इतिहास को भी वस्तुनिष्ठ ज्ञान कह सकते हैं।

ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठा एवं विज्ञान की वस्तुनिष्ठा में अन्तर-

इतिहास विशुद्ध विज्ञान न होकर भी विज्ञान है। अत: विज्ञान की वस्तुनिष्ठा इतिहास में सम्भव नहीं है। इसलिए इतिहास और प्राकृतिक विज्ञानों की वस्तुनिष्ठा में अन्तर स्वाभाविक है। डॉ. गोविन्दचन्द्र पाण्डेय ने लिखा है कि "इतिहास में विज्ञान की विशिष्ट प्रयोगात्मक सत्यापन की विधि का कोई स्थान नहीं है। इतिहासकार का उद्देश्य इतिहास लिखना होता है न कि इतिहास बनाना। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इतिहास में गतिणसिद्ध तर्क-प्रक्रिया का भी कोई स्थान नहीं है। इतिहास एक वर्णनात्मक विधा है न कि निगमात्मक अथवा प्रयोगात्मक। विज्ञान नितान्त वस्तुपरक होता है, मूल्यपूरक नहीं। उसकी दृष्टि अपने विषय की ओर सर्वथा तटस्थ या मूल्य निरपेक्ष होती है। इतिहासकार को दृष्टि न केवल तथ्यनिष्ठ होती है, बल्कि सत्यनिष्ठ भी होती है। वह वस्तु के साथ-साथ मूल्य का भी अनुभव करता है, यह तर्क के साथ विवेक का उपयोग करता है और विवेक का यह उपयोग उसकी पद्धति की बौद्धिकता को चार चाँद लगाता है।"

निःसन्देह इतिहास की वस्तुनिष्ठा व विज्ञान की वस्तुनिष्ठा में अन्तर है। हम देखते हैं कि विज्ञान की वस्तुनिष्ठा के समान इतिहास की वस्तुनिष्ठा तर्क व सामान्यीकरण पर आधारित नहीं होती। वास्तव में इतिहास में वस्तुनिष्ठा वस्तुपरक के साथ मूल्यपरक भी होती है। इतिहास के मूल्यों का निर्धारण इतिहासकार अपने विषयवस्तु के विवेचन से करता है । वैज्ञानिक जिस सत्य, का निरूपण अपनी प्रयोगशाला में करता है, इतिहासकार उस सत्य का निरूपण अपनी विवेचना से करता है। यद्यपि वे सत्यों का विश्लेषण अलग-अलग ढंग से करते हैं तथापि यथार्थता के आग्रह पर वे समान होते हैं।

डॉ. गोविन्दचन्द्र पाण्डेय लिखते हैं कि "वैज्ञानिक और इतिहासकार की मूल समानता दोनों का यथार्थता पर आग्रह है। ज्ञान यथार्थ है अथवा अयथार्थ, इसका निर्णय प्रमाणों से होता है। इतिहास भी विज्ञान के समान प्रमाणाश्रित ज्ञान है। यही इतिहास की वैज्ञानिकता है, किन्तु प्रमाण- प्रयोग के विस्तार में क्षेत्रीय भेद होना स्वाभाविक है । इतिहास ज्ञान का उदय स्मृति से अथवा कल्पना से नहीं होता, बल्कि प्रमाण से और परीक्षापूर्वक होता है। इस प्रकार ऐतिहासिक ज्ञान प्रमाणाश्रित आलोचनात्मक ज्ञान है। इस बात का मुख्य रूप सम्भावनात्मक अनुमान है।" इतिहासकार का यह अनुमान इतिहास ज्ञान के भौतिक अवशेषों पर निर्भर होता है। ऐतिहासिक साक्ष्य के ये अवशेष अनिश्चित भी होते हैं। अत: उनके साथ सम्भावना का अंश लगा रहता है। प्राकृतिक विज्ञान के साक्ष्यों के समान वह सत्यापित नहीं होता। इसलिए इतिहास की वस्तुनिष्ठा के लिए इतिहासकार का बौद्धिक ज्ञान ही निर्णायक होता है।

ई.एच. कार ने इतिहास की वस्तुनिष्ठा को तथ्यों की वस्तुनिष्ठा न मानकर उसे सम्बन्धों की वस्तुनिष्ठा मानते हुए कहा है कि "इतिहास के तथ्य शुद्ध वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकते क्योंकि वे इतिहास के तथ्य तभी बनते हैं, जब इतिहासकार उनको महत्त्व देता है। इतिहास में वस्तुनिष्ठा, अगर हम अब भी इस परम्परागत शब्द का प्रयोग करें, तथ्यों की वस्तुनिष्ठा नहीं हो सकती, बल्कि केवल सम्बन्धों की वस्तुनिष्ठा होती है। तथ्यों और उनकी व्याख्या के बीच के सम्बन्ध अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच सम्बन्ध हैं।"

प्राकृतिक विज्ञान और इतिहास की विषयवस्तु भिन्न है। प्राकृतिक विज्ञान जहाँ जड़ तथा अचेतन वस्तुओं से सम्बन्ध रखते हैं, वहाँ इतिहास सजीव चेतन मानव के क्रियाकलापों से सम्बन्ध रखता है। यह भेद इन दोनों की वस्तुनिष्ठा में अन्तर ला देता है। इतिहास में विज्ञान जैसी वस्तुनिष्ठा सम्भव नहीं और इतिहास में वस्तुनिष्ठा तभी सम्भव हो सकती है, जब इतिहासकार पूरी ईमानदारी के साथ उसमें आरोपित करे। फिर भी इतिहास में पूर्ण वस्तुनिष्ठा सम्भव नहीं। हम अन्ततः इतिहास को वस्तुनिष्ठ ज्ञान कह सकते हैं, भले ही उसमें विज्ञान की अपेक्षा कम वस्तुनिष्ठा है।

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