ब्रिटिश संविधान में अभिसमय : अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ एवं महत्त्व

📌 परिचय-

ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों के अर्थ, प्रकार एवं महत्त्व का अध्ययन संविधान की अलिखित परंपराओं को समझने के लिए बहुत जरूरी है। ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों की भूमिका शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और विभिन्न संवैधानिक अंगों के बीच संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण होती है।

ये ऐसे नियम हैं जो लिखित नहीं होते, फिर भी व्यवहार में अनिवार्य रूप से पालन किए जाते हैं। इसी संदर्भ में यह भी समझना आवश्यक है कि ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों का पालन क्यों किया जाता है? क्योंकि ये परंपरा, लोकमत और शासन की उपयोगिता पर आधारित होते हैं।

इस पोस्ट में आप ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों के अर्थ, प्रकार एवं महत्त्व, ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों की भूमिका, तथा ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों का पालन क्यों किया जाता है? ये सभी जानेंगे।

📘 अभिसमय का अर्थ

ब्रिटेन के संविधान में समय-समय पर कुछ ऐसी संवैधानिक परंपराएँ विकसित हुई हैं, जो न तो संसद द्वारा बनाए गए कानूनों में शामिल होती हैं और न ही न्यायालयों द्वारा इन्हें औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त होती है, फिर भी व्यवहार में इनका पालन पूरी सहमति से किया जाता है। इन्हीं परंपराओं को अभिसमय कहा जाता है।

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ब्रिटिश संविधान में अभिसमय

इस प्रकार अभिसमय संविधान के वे मूलभूत नियम हैं जो अलिखित होते हुए भी शासन व्यवस्था के प्रमुख एवं दैनिक व्यावहारिक संबंधों तथा कार्यों का संचालन करते हैं। इनमें विभिन्न रीति-रिवाज, समझौते, आचरण और व्यवहार शामिल होते हैं, जो लंबे समय तक प्रयोग में आने तथा राजनीतिक महत्व के कारण शासन के उच्च अधिकारियों के पारस्परिक संबंधों को निर्धारित करते हैं। ये अभिसमय न केवल विधि व्यवस्था को संचालित करते हैं, बल्कि उसे सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार लचीला और परिवर्तनशील भी बनाते हैं।

📖 अभिसमयों की परिभाषाएँ

1. प्रोफेसर डायसी के अनुसार-

संविधान के अभिसमय वे रीति-रिवाज या समझौते हैं जिनके अनुसार पूर्व-प्रभुत्व प्राप्त विधानमंडल के विभिन्न अंगों को अपने विवेकाधीन अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए, चाहे वे सम्राट के अधिकार हों या संसद के विशेषाधिकार।

2. हरमन फाइनर के अनुसार-

अभिसमय राजनीतिक आचरण के वे नियम हैं जिनकी स्थापना न तो विधियों, न न्यायिक निर्णयों और न ही संसदीय परंपराओं के अंतर्गत होती है, बल्कि ये उनसे अलग होते हुए उनके पूरक के रूप में कार्य करते हैं।

3. जॉन स्टुअर्ट मिल के अनुसार-

अभिसमय संशोधन के अलिखित सूत्र हैं।

4. प्रो. ऑग के अनुसार-

अभिसमय उन रीति-रिवाजों, समझौतों, स्वभाव और व्यवहारों का नाम है, जो राजनीतिक नैतिकता के नियम होते हुए भी शासन के उच्च अधिकारियों के दैनिक पारस्परिक संबंधों और कार्यों को नियंत्रित करते हैं।

🔑 अभिसमयों के प्रमुख लक्षण

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर अधिसमयों के तीन लक्षण बताये जा सकते हैं यथा-

1. स्रोत-

अभिसमयों का मूल स्रोत प्रथाएँ होती हैं। जब ये प्रथाएँ लंबे समय तक प्रयोग में रहकर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर लेती हैं, तो वे अभिसमय का रूप ले लेती हैं।

2. पालन का आधार-

इनका पालन लोकमत, आपसी सहमति और व्यावहारिक उपयोगिता के कारण किया जाता है।

3. कानूनी मान्यता का अभाव-

अभिसमयों को कानूनी या न्यायिक मान्यता प्राप्त नहीं होती, फिर भी व्यवहार में इनका पालन कानून के समान ही किया जाता है और इन्हें लगभग वैसी ही पवित्रता प्राप्त होती है।

📌 अभिसमयों की विशेषताएँ

(1) अलिखित-

अभिसमय अलिखित होते हैं और ये रीति-रिवाजों तथा परंपराओं का परिणाम होते हैं। जॉन स्टुअर्ट मिल ने अभिसमयों को संविधान के अलिखित सूत्र माना है।

(2) परंपरागत-

अभिसमय संविधान की परंपराएँ हैं जो प्रशासनिक व्यवहार को नियंत्रित करती हैं, लेकिन ये कठोर रूप से कानून की श्रेणी में नहीं आते। ये राजा, मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यों को नियंत्रित करने वाले व्यवहारिक नियम होते हैं।

(3) परिवर्तनशील-

रीति-रिवाज और परंपराएँ समय एवं सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती हैं। इसी प्रकार ब्रिटिश अभिसमय भी परिवर्तनशील होते हैं। ऑग और जिंक के शब्दों में, "अभिसमय कानून की हड्डियों को गोश्त से मढ़ते हैं और कानूनी संरचना को क्रियाशील बनाते हैं तथा उसे परिवर्तनशील सामाजिक आवश्यकताओं और राजनीतिक विचारों के अनुकूलतम बनाये रखते हैं।"

(4) संविधान का अंग-

अभिसमय संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। भले ही ये विधिवत अधिनियमित न हों, फिर भी जनता में इनके प्रति गहरी आस्था होती है।

(5) संवैधानिक व्यवहार के नियम-

अभिसमयों के कारण संविधान का क्रियान्वयन सरल और व्यवस्थित होता है, इसलिए इन्हें संवैधानिक व्यवहारिक नियम भी कहा जाता है।

(6) कानूनों से निम्न-

अभिसमयों को न्यायालय में कानून की तरह लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए ये कानून से निम्न स्तर पर माने जाते हैं।

⚖️ अभिसमय और कानून में अंतर

(i) स्रोत संबंधी अंतर-

अभिसमय का स्रोत रीति-रिवाज, परंपराएँ और व्यवहार हैं, जबकि कानून का स्रोत विधायिका या राज्य की शक्ति होती है।

(ii) पालन संबंधी अंतर-

अभिसमय नैतिक और परंपरागत होने के कारण बाध्यकारी नहीं होते, जबकि कानून शक्ति पर आधारित होने से अनिवार्य रूप से बाध्यकारी होते हैं।

(iii) मान्यता संबंधी अंतर-

अभिसमय की मान्यता उपयोगिता और सुविधा पर आधारित होती है, जबकि कानून की मान्यता राज्य की शक्ति और सामाजिक व्यवस्था पर आधारित होती है।

(iv) क्षेत्र संबंधी अंतर-

अभिसमय समाज और राजनीतिक व्यवहार से जुड़े होते हैं, जबकि कानून राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

(v) निर्माण संबंधी अंतर-

अभिसमय का निर्माण धीरे-धीरे परंपराओं के माध्यम से होता है, जबकि कानून किसी संस्था, व्यक्ति या सभा द्वारा बनाए जाते हैं।

(vi) संरक्षण संबंधी अंतर-

अभिसमयों को न्यायालय का संरक्षण प्राप्त नहीं होता, जबकि कानून को न्यायालय द्वारा पूर्ण संरक्षण प्राप्त होता है।

(vii) स्वरूप संबंधी अंतर-

अभिसमय अनिश्चित और लचीले होते हैं, जबकि कानून लिखित और स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं।

📌 अभिसमयों के उदाहरण / प्रकार

ब्रिटेन में संवैधानिक अभिसमयों का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इन्हें निम्न प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है

(अ) राजा से संबंधित अभिसमय-

(i) राजा अपने मंत्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करता है।

(ii) राजा कॉमन सभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।

(iii) राजा कैबिनेट की बैठकों की न तो अध्यक्षता करता है और न ही उनमें भाग लेता है।

(iv) राजा प्रधानमंत्री की सलाह पर कॉमन सभा को भंग करता है।

(v) संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक पर राजा अपने निषेधाधिकार (Veto) का प्रयोग नहीं करता।

(ब) कैबिनेट से संबंधित अभिसमय-

(i) प्रधानमंत्री कॉमन सभा का सदस्य होना चाहिए।

(ii) प्रधानमंत्री कैबिनेट का गठन करता है।

(iii) कैबिनेट के सदस्यों का चयन बहुमत दल के संसद सदस्यों में से किया जाता है।

(iv) सरकार तब तक अपने पद पर बनी रहती है जब तक उसे कॉमन सभा का विश्वास प्राप्त हो।

(v) कैबिनेट सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होती है।

(स) संसद से संबंधित अभिसमय-

(i) संसद को सर्वोच्च संस्था माना जाता है।

(ii) संसद का अधिवेशन वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य होना चाहिए।

(iii) किसी भी विधेयक को पारित होने से पहले तीन वाचन (Three Readings) से गुजरना चाहिए।

(iv) स्पीकर को निष्पक्ष और निर्दलीय होना चाहिए।

(v) एक बार स्पीकर बनने के बाद व्यक्ति परंपरागत रूप से उसी पद पर बना रहता है जब तक वह स्वयं इस्तीफा न दे।

(vi) स्पीकर अपने निर्णायक मत का प्रयोग नहीं करता।

(vii) जब लार्ड सभा अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्य करती है, तब केवल लॉ लॉर्ड्स ही उसमें भाग लेते हैं।

(viii) वित्त विधेयक (Finance Bill) पहले कॉमन सभा में प्रस्तुत किया जाता है।

📌 अभिसमयों का पालन क्यों किया जाता है?

ब्रिटेन में संवैधानिक अभिसमयों का पालन उसी प्रकार किया जाता है जैसे लिखित कानूनों का किया जाता है। यद्यपि ये कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, फिर भी इनका पालन अनेक राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक कारणों से अनिवार्य माना जाता है। इस विषय पर विभिन्न विद्वानों जैसे डायसी, लास्की और लॉवेल ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।

(1) परंपराओं के उल्लंघन में कानून के उल्लंघन का भय (डायसी का विचार)-

डायसी के अनुसार, अभिसमय और कानून आपस में इतने गहराई से जुड़े हुए हैं कि यदि किसी परंपरा का उल्लंघन किया जाए तो अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी कानून का उल्लंघन भी हो सकता है। इसलिए कानून के उल्लंघन से बचने के लिए अभिसमयों का पालन करना आवश्यक हो जाता है। दूसरे शब्दों में, अभिसमय के टूटने से कहीं न कहीं कानून को भी क्षति पहुँचती है, इसलिए इनका पालन अनिवार्य माना जाता है।

डायसी के मत की आलोचना (Criticism of Dicey’s View)

डायसी का यह विचार सभी अभिसमयों पर लागू नहीं होता, इसलिए इसे पूर्णतः सही नहीं माना जाता।

(i) सभी अभिसमयों पर लागू नहीं- उदाहरण के लिए, विधेयक निर्माण में तीन वाचन के स्थान पर यदि दो वाचन भी कर दिए जाएँ, तो कोई कानून का उल्लंघन नहीं होता, फिर भी इस अभिसमय का पालन किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि हर अभिसमय कानून से जुड़ा नहीं होता।

(ii) अतार्किक दृष्टिकोण- डायसी का मत इसलिए भी तर्कसंगत नहीं माना जाता क्योंकि संवैधानिक दृष्टि से संसद का बजट अधिवेशन हर वर्ष होना अनिवार्य नहीं है, फिर भी यह परंपरा के रूप में नियमित रूप से किया जाता है।

(iii) संसदीय सर्वोच्चता के सिद्धांत के विपरीत- यह विचार संसदीय सर्वोच्चता के सिद्धांत के भी विरुद्ध जाता है, क्योंकि संसद अपनी आवश्यकतानुसार नियमों और परंपराओं में परिवर्तन कर सकती है।

(2) उपयोगिता पर आधारित (लास्की का मत)-

लास्की के अनुसार, अभिसमयों के पालन का मुख्य कारण उनकी उपयोगिता है। ये संविधान को प्रभावी रूप से लागू करने में सहायता करते हैं और शासन व्यवस्था को सुचारु बनाते हैं।

(3) परंपराएँ जन-इच्छा पर आधारित अथवा लोकमत की शक्ति (लॉवेल का मत)-

लॉवेल के अनुसार संवैधानिक परंपराओं का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि ये नैतिकता पर आधारित नियम होते हैं और इन्हें लोकमत का मजबूत समर्थन प्राप्त होता है। उनके अनुसार अंग्रेज समाज स्वभाव से परंपरावादी और रूढ़िवादी होता है, इसलिए उन्हें अपनी परंपराओं से विशेष लगाव होता है। वे परंपरागत और पुरानी व्यवस्थाओं को बनाए रखने के लिए अपने जीवन में कुछ असंगतियाँ स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन उन्हें छोड़ना पसंद नहीं करते। इसी कारण वे संवैधानिक परंपराओं का सम्मान करते हैं।

चूंकि परंपराओं को जनता का समर्थन प्राप्त होता है, इसलिए जनता द्वारा चुनी गई प्रतिनिधि सरकार भी उनका पालन करती है। कोई भी सरकार उस व्यवस्था के विरुद्ध नहीं जा सकती जिसे जनता स्वीकार करती हो और पसंद करती हो।

उदाहरण (Example)-

मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता से संबंधित परंपरा इसका प्रमुख उदाहरण है। प्रारंभ में राजा मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता था। लेकिन जॉर्ज राजाओं के काल में यह परंपरा बदल गई, क्योंकि राजा को अंग्रेजी भाषा का पर्याप्त ज्ञान नहीं था और उन्हें ब्रिटिश राजनीति में अधिक रुचि भी नहीं थी।

इसके बाद प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करनी शुरू की, जो धीरे-धीरे एक स्थापित परंपरा बन गई। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अधिक अनुकूल थी, इसलिए इसे व्यापक स्वीकृति मिली। समय के साथ यह परंपरा इतनी मजबूत हो गई कि तीसरे जॉर्ज द्वारा पुनः अध्यक्षता करने का प्रयास भी मंत्रिमंडल के विरोध के कारण असफल रहा।

यह परंपरा आज भी इसी रूप में जारी है क्योंकि यह लोकतंत्र की निरंतरता और स्थिरता बनाए रखने में सहायक है।

(4) शासक वर्ग की इच्छा-

शासक वर्ग भी चाहता है कि परंपराओं का पालन होता रहे ताकि शासन व्यवस्था स्थिर और सुचारु बनी रहे।

(5) सभी राजनीतिक दलों का एकमत होना ( लास्की का मत)-

लास्की के अनुसार अभिसमयों के पालन का एक प्रमुख कारण यह है कि सभी राजनीतिक दल देश के सामाजिक और राजनीतिक ढाँचे की मूलभूत बातों पर सामान्य रूप से सहमत होते हैं। इसी कारण इनसे संबंधित परंपराएँ भी सभी दलों द्वारा समान रूप से स्वीकार की जाती हैं।

राजनीतिक दलों में यह सहमति कुछ आधारभूत कारणों से होती है, जैसे संसदीय लोकतंत्र में आस्था और व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार में विश्वास। यदि राजनीतिक दलों के बीच सामाजिक और राजनीतिक संरचना के मूल सिद्धांतों पर गंभीर मतभेद होते, तो संभव है कि वे समान संवैधानिक परंपराओं को स्वीकार न करते।

(6) राजनीतिक कठिनाइयों का भय-

यदि अभिसमयों का पालन न किया जाए तो अनेक राजनीतिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। अभिसमयों का उल्लंघन संपूर्ण ब्रिटिश शासन व्यवस्था को संकट में डाल सकता है और राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।

लॉवेल के अनुसार, यदि शासन करने वाले वर्ग द्वारा अभिसमयों का उल्लंघन किया जाए तो देश में विरोध की लहर फैल सकती है और सरकार को भी गंभीर राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसी संभावना के कारण शासक वर्ग अभिसमयों का पालन करता है ताकि शासन व्यवस्था स्थिर और सुरक्षित बनी रहे।

(7) ब्रिटिश जाति की राजनीतिक जागरूकता-

ब्रिटिश जनता राजनीतिक दृष्टि से अत्यधिक जागरूक मानी जाती है। इसी कारण वहाँ अभिसमयों के उल्लंघन की स्थिति लगभग उत्पन्न ही नहीं होती। जनता और शासक दोनों ही संवैधानिक व्यवस्था के प्रति सजग रहते हैं, जिससे परंपराओं का पालन स्वाभाविक रूप से होता रहता है।

(8) ब्रिटिश जाति का स्वभाव-

ब्रिटिश लोग परंपरा-प्रिय और रूढ़िवादी स्वभाव के होते हैं। वे संवैधानिक अभिसमयों के पालन के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि ये नियम उनके व्यवहार और सोच का हिस्सा बन चुके हैं। परिणामस्वरूप वे स्वाभाविक रूप से इन परंपराओं का पालन करते हैं।

(9) नैतिक शक्ति-

लॉवेल के अनुसार अभिसमयों का पालन इसलिए किया जाता है क्योंकि शासक और शासित दोनों वर्ग इन्हें एक नैतिक संहिता के रूप में स्वीकार करते हैं। ये नियम पवित्र माने जाते हैं और व्यवहार में इनके उल्लंघन की संभावना बहुत कम होती है।

लॉवेल के शब्दों में, अभिसमय ऐसे नियम हैं जो सदाचार की आचार संहिता के समान होते हैं। ये खेल के नियमों की तरह माने जाते हैं, जिन्हें समाज का प्रभावशाली वर्ग अत्यंत सम्मान और संवेदनशीलता के साथ अपनाता है। इसी कारण अभिसमय ब्रिटिश शासन व्यवस्था में मजबूत और प्रभावी बने रहते हैं।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. ब्रिटिश संविधान में अभिसमय क्या हैं?

अभिसमय वे अलिखित संवैधानिक परंपराएँ हैं, जिनका कानून द्वारा निर्माण नहीं होता, फिर भी व्यवहार में इनका पालन किया जाता है।

2. अभिसमयों की मुख्य विशेषता क्या है?

इनकी मुख्य विशेषता यह है कि ये अलिखित, परंपरागत, परिवर्तनशील और कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।

3. अभिसमय और कानून में क्या अंतर है?

अभिसमय नैतिक और परंपरागत होते हैं, जबकि कानून लिखित, स्पष्ट और न्यायालय द्वारा लागू किए जाने योग्य होते हैं।

4. ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों की भूमिका क्या है?

ये शासन व्यवस्था को सुचारु बनाते हैं और राजा, कैबिनेट तथा संसद के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।

5. अभिसमयों का पालन क्यों किया जाता है?

इनका पालन लोकमत, उपयोगिता, नैतिक शक्ति, राजनीतिक स्थिरता और परंपरा के कारण किया जाता है।

6. क्या अभिसमय कानूनी रूप से लागू होते हैं?

नहीं, अभिसमय को न्यायालय में कानून की तरह लागू नहीं किया जा सकता।

7. अभिसमयों का विकास कैसे होता है?

इनका विकास धीरे-धीरे परंपराओं, रीति-रिवाजों और राजनीतिक व्यवहार के आधार पर होता है।

8. ब्रिटिश संविधान को अलिखित संविधानक्यों कहा जाता है?

क्योंकि इसमें कई महत्वपूर्ण नियम अभिसमयों के रूप में अलिखित हैं।

9. अभिसमयों का महत्व क्या है?

ये संविधान को लचीलापन प्रदान करते हैं और उसे समय के अनुसार बदलने योग्य बनाते हैं।

10. क्या अभिसमय बदले जा सकते हैं?

हाँ, अभिसमय समय और परिस्थितियों के अनुसार बदले जा सकते हैं क्योंकि ये कठोर कानून नहीं होते।

📌 निष्कर्ष (Conclusion)

अंततः यह कहा जा सकता है कि ब्रिटिश संविधान में अभिसमय (Conventions) केवल अलिखित परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि ये सम्पूर्ण शासन व्यवस्था की रीढ़ के समान हैं। ये संविधान को लचीलापन प्रदान करते हैं और बदलती सामाजिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुसार उसे अनुकूल बनाने में सहायता करते हैं।

ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों के अर्थ, प्रकार एवं महत्त्व का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि ये शासन के विभिन्न अंगोंराजा, कैबिनेट और संसदके बीच संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साथ ही, ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों की भूमिका यह भी सिद्ध करती है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल लिखित कानूनों पर ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक परंपराओं पर भी आधारित होती है।

इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश संविधान में अभिसमयों का पालन क्यों किया जाता है? इसका उत्तर उपयोगिता, लोकमत, नैतिक शक्ति, राजनीतिक स्थिरता और परंपरागत स्वभाव जैसे अनेक कारणों में निहित है। यही कारण है कि ये अभिसमय आज भी ब्रिटिश संवैधानिक प्रणाली को स्थिर, प्रभावी और संतुलित बनाए रखते हैं।

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