🟢 परिचय (Introduction)
ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए “ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता (british sansad ki sarvochta), ब्रिटेन में संसद की सर्वोच्चता (Parliamentary Sovereignty), british sansad ki sarvochta ka kya aashay hai जैसे विषय बहुत महत्वपूर्ण हैं। ब्रिटिश संविधान में संसद को सर्वोच्च शक्ति प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि वह देश की सर्वोच्च विधि-निर्माता संस्था है।
ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता का क्या अर्थ है, इसकी सीमाएं क्या हैं और
यह कैसे कार्य करती है—इन सभी प्रश्नों को समझना आधुनिक लोकतांत्रिक
व्यवस्था के अध्ययन में आवश्यक है। ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली में
संसद को “सर्वोच्च सत्ता” माना जाता है क्योंकि यह
कानून बना सकती है, बदल सकती है और समाप्त भी कर सकती है।
🏛️ ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता का अर्थ
ब्रिटेन में संसद को सर्वोच्च एवं सम्प्रभु संस्था माना जाता है। उसकी शक्ति
सर्वाधिक, व्यापक और असीमित मानी जाती है। संसद ही पूरे शासन
तंत्र का संचालन करती है। वह सम्राट् को भी पद से हटा सकती है। संसद राजा का चयन
कर सकती है तथा राजतंत्र को समाप्त करने का अधिकार भी रखती है।
इसी कारण ब्लेकस्टोन, सर एडवर्ड कोक, ऑग, सर मेथ्यू हेल, डी. लाम, मेरियट, डायसी आदि विद्वानों ने
कानून निर्माण के क्षेत्र में ब्रिटिश संसद को सर्वोच्च माना है।
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| ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता |
फ्रीडमैन के अनुसार, "संसद के पास कानून बनाने की असीमित शक्ति होती है। संसद जिस
विधेयक को पारित कर देती है, वही कानून बन जाता है। उसकी वैधानिकता नैतिकता के उच्च
सिद्धान्तों, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय सिद्धान्तों पर निर्भर नहीं
करती।"
⚖️ ब्रिटिश संसद की
सर्वोच्चता का आशय
संसद की सर्वोच्चता का आशय मुख्य रूप से निम्न
बिंदुओं से समझा जा सकता है—
(1) कानून निर्माण तथा किसी भी कानून में परिवर्तन की असीम शक्ति-
डायसी के अनुसार संसद की सर्वोच्चता का प्रमुख आधार उसकी कानून बनाने की असीमित
शक्ति है। वह किसी भी विषय पर कोई भी कानून बना सकती है। इतना ही नहीं, वह पूर्व में पारित किसी
भी संसदीय कानून को समाप्त, संशोधित या परिवर्तित कर सकती है।
(2) ब्रिटिश संसद : विधि निर्माण की सर्वोच्च एवं एकमात्र संस्था-
ब्रिटेन में एकात्मक शासन व्यवस्था होने के कारण संसद ही कानून निर्माण
करने वाली सर्वोच्च संस्था मानी जाती है। ब्रिटिश संविधान संसद के
अतिरिक्त किसी अन्य संस्था को कानून बनाने का अधिकार प्रदान नहीं करता।
(3) न्यायिक समीक्षा का अभाव-
डायसी ने संसद की सर्वोच्चता का तीसरा कारण यह बताया कि वहाँ न्यायपालिका को
संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
न्यायपालिका वैधानिकता अथवा अवैधानिकता के आधार पर किसी संसदीय कानून को निरस्त
नहीं कर सकती। संसद द्वारा बनाए गए कानून अन्तिम माने जाते हैं। न्यायालय
संसद की सभी विधियों को वैध मानने के लिए बाध्य होता है। इंग्लैण्ड में कोई
व्यवस्था नैतिक,
राजनीतिक, सामाजिक अथवा व्यावहारिक
दृष्टि से कितनी भी अनुचित क्यों न हो, यदि उसे संसद के कानून द्वारा स्थापित किया गया है तो
न्यायालय या कोई अन्य संस्था उसे असंवैधानिक घोषित नहीं कर सकती।
इस प्रकार स्पष्ट है कि संसद की शक्तियाँ अत्यन्त व्यापक और असीमित हैं। यह
असीमित शक्ति ब्रिटिश संविधान तथा शासन व्यवस्था की कुछ विशेषताओं के कारण प्राप्त
हुई है। इनमें प्रमुख हैं— लचीला संविधान, एकात्मक शासन व्यवस्था तथा न्यायिक पुनरावलोकन की व्यवस्था का अभाव।
(4) साधारण तथा संवैधानिक कानूनों पर समान अधिकार-
संसद को साधारण कानूनों तथा संवैधानिक कानूनों दोनों पर समान अधिकार प्राप्त है।
जिस साधारण बहुमत से वह सामान्य कानून पारित करती है, उसी साधारण बहुमत से
संवैधानिक कानून भी पारित कर सकती है। इसी विशेषता के कारण ब्रिटिश संविधान को
लचीला संविधान कहा जाता है।
🚧 ब्रिटिश संसदीय
सर्वोच्चता की सीमाएँ
संसद की सर्वोच्चता पर निम्नलिखित प्रकार की सीमाएँ (Limitations over
Parliamentary Supremacy) मानी जाती हैं—
(1) लोकमत-
लोकमत संसदीय सम्प्रभुता पर सबसे बड़ा व्यावहारिक नियंत्रण माना जाता है। विधि
सम्बन्धी सभी प्रस्तावों को व्यावहारिक एवं नैतिक महत्त्व की कसौटी पर परखा जाता
है। यह ध्यान रखा जाता है कि कोई कानून प्राकृतिक नियमों, जनता की इच्छाओं तथा परम्पराओं
के विपरीत न हो। इसलिए संसद सामान्यतः स्वयं को व्यावहारिक मर्यादाओं में रखती है।
(2) प्रत्यक्ष प्रजातंत्र के साधनों (जनमत संग्रह) का प्रयोग-
ब्रिटेन में जनमत संग्रह जैसे प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक साधनों की वैधानिक
व्यवस्था नहीं है। फिर भी जब संसद ने महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर कानून
बनाए हैं, तब उसने जनता से राजनीतिक
समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया है। उदाहरण के रूप में, ई.ई.सी. की ब्रिटिश
सदस्यता के प्रश्न पर 1975 में जनमत संग्रह कराया गया था।
(3) नैतिक सीमाएँ-
व्यवहार में संसद ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जो समाज की नैतिक एवं
धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध हो। जेनिंग्स ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए
कहा है कि, “यदि कोई व्यवस्थापिका यह
निर्णय करे कि नीली आँखों वाले बच्चों की हत्या कर दी जाए, तो ऐसे बच्चों को बचाना
अवैध होगा, परन्तु ऐसा कार्य केवल पागल
व्यवस्थापिका ही कर सकती है और उसका पालन भी पागल जनता ही करेगी।”
(4) प्रदत्त व्यवस्थापन-
प्रदत्त व्यवस्थापन ने भी संसदीय सर्वोच्चता को सीमित किया है। संसद समय तथा
तकनीकी ज्ञान के अभाव में केवल कानूनों की रूपरेखा पारित करती है और उनके विस्तृत
नियम बनाने का अधिकार कार्यपालिका को दे देती है। इससे एक ओर कार्यपालिका
की शक्तियों में वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर संसद की शक्तियाँ व्यवहारिक रूप से सीमित हुई हैं।
(5) विधि का शासन-
ब्रिटेन में संसदीय सर्वोच्चता और विधि का शासन परस्पर सम्बन्धित एवं
एक-दूसरे पर आश्रित हैं। फिर भी विधि स्वयं संसद को सीमित करती है। जब तक कोई
कानून प्रभावी रहता है और उसे किसी अन्य कानून द्वारा समाप्त नहीं किया जाता, तब तक संसद भी उसका पालन
करने के लिए बाध्य रहती है। कानून का उल्लंघन जन-आक्रोश को जन्म दे सकता है।
(6) परम्पराएँ-
सिद्धान्ततः ब्रिटिश संसद किसी भी परम्परा को कानून द्वारा समाप्त या
परिवर्तित कर सकती है, किन्तु व्यवहार में संसद ऐसा करने से बचती है। यदि संसद जनता की स्वीकृति के
बिना किसी स्थापित संवैधानिक परम्परा में परिवर्तन करती है, तो ब्रिटिश जनता उसे सहज
रूप से स्वीकार नहीं करेगी।
(7) अन्तर्राष्ट्रीय कानून-
व्यवहार में ब्रिटिश संसद अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों से भी प्रभावित रहती
है। सामान्यतः ब्रिटिश संसद ऐसे राष्ट्रीय कानूनों का निर्माण नहीं करती जो
अन्तर्राष्ट्रीय कानून के विरुद्ध हों।
(8) वेस्टमिन्स्टर परिनियम, 1931 -
1931 के वेस्टमिन्स्टर परिनियम ने भी संसद की शक्तियों को सीमित
किया। इस अधिनियम के अनुसार, 1931 के बाद ब्रिटिश संसद किसी अधिराज्य के लिए तब तक कोई कानून नहीं बनाएगी, जब तक उस अधिराज्य की
संसद स्वयं ब्रिटिश संसद से ऐसा करने का अनुरोध न करे।
(9) मंत्रिमण्डल द्वारा संसद पर नियंत्रण-
मंत्रिमण्डल भी संसद पर प्रभावी नियंत्रण रखता है। रैम्जे म्योर
के अनुसार, संसद पूर्णतः स्वतंत्र
रूप से कार्य नहीं करती, बल्कि दलीय आधार पर कार्य करती है। इसलिए व्यवहार में मंत्रिमण्डल अपने दलीय
बहुमत के आधार पर संसद की कानून निर्माण शक्ति को नियंत्रित एवं संचालित करता है।
(10) आन्तरिक तथा बाह्य सीमाएँ-
लेसली स्टेफन के अनुसार, “संसद आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार की सीमाओं से बँधी
होती है। आन्तरिक रूप से वह इसलिए सीमित है क्योंकि व्यवस्थापिका समाज की निश्चित
परिस्थितियों की उपज होती है और उन्हीं के अनुसार कार्य करती है। बाह्य रूप से वह
इसलिए सीमित है क्योंकि कानून को लागू करने की शक्ति लोगों की आज्ञापालन की
स्वाभाविक प्रवृत्ति पर निर्भर करती है, और यह प्रवृत्ति स्वयं सीमित होती है।”
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने
वाले प्रश्न)
1. ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता क्या है?
ब्रिटिश संसद को कानून बनाने, बदलने और समाप्त करने की सर्वोच्च शक्ति प्राप्त है।
2. ब्रिटिश संसद को सर्वोच्च क्यों कहा जाता है?
क्योंकि वह किसी भी कानून को बना या बदल सकती है।
3. क्या ब्रिटिश संसद पर कोई सीमा है?
हाँ, लोकमत, परंपराएँ और अंतरराष्ट्रीय कानून इसकी सीमाएँ हैं।
4. क्या न्यायालय संसद के कानून को बदल सकते हैं?
नहीं, ब्रिटेन में न्यायिक समीक्षा सीमित है।
5. ब्रिटिश संविधान कैसा है?
यह एक लचीला संविधान है।
6. संसद कौन-कौन से कानून बना सकती है?
साधारण और संवैधानिक दोनों प्रकार के कानून।
7. क्या संसद राजा को बदल सकती है?
हाँ, सैद्धांतिक रूप से कर सकती है।
8. जनमत संग्रह क्या है?
यह जनता से सीधे राय लेने की प्रक्रिया है।
9. वेस्टमिन्स्टर परिनियम 1931 क्या है?
यह अधिराज्यों के लिए कानून निर्माण पर सीमाएँ लगाता है।
10. क्या संसद की शक्ति असीमित है?
सिद्धांततः हाँ, लेकिन व्यवहार में कई सीमाएँ हैं।
🧾 निष्कर्ष (Conclusion)
ब्रिटिश संसद की सर्वोच्चता ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था का मूल आधार है। सैद्धांतिक रूप
से संसद को असीमित शक्तियाँ प्राप्त हैं, लेकिन व्यवहार में लोकमत, परंपराएँ, न्याय व्यवस्था और
अंतरराष्ट्रीय नियम इसकी शक्ति को सीमित करते हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि ब्रिटिश संसद सर्वोच्च होते हुए भी
पूरी तरह निरंकुश नहीं है, बल्कि एक संतुलित लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
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