🧭 परिचय (Introduction)
लॉर्ड सभा (House of Lords) ब्रिटिश संसद का उच्च सदन है, जिसकी भूमिका और उपयोगिता
को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और शैक्षणिक जगत में बहस चलती रही है।
“लॉर्ड सभा की भूमिका का मूल्यांकन”, “लॉर्ड सभा की क्या
उपयोगिता है”, “लॉर्ड सभा का महत्व” और “हाउस ऑफ लॉर्ड्स की
भूमिका और कार्य” जैसे प्रश्न आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसके स्थान को
समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
कई विद्वानों का मानना है कि यह संस्था वंशानुगत आधार पर बनी होने के कारण अलोकतांत्रिक है, जबकि कुछ इसे ब्रिटिश संसदीय परंपरा का संतुलन बनाए रखने वाली आवश्यक संस्था मानते हैं। इस प्रकार इसके सुधार या समाप्ति पर भी लगातार बहस जारी रही है।
⚖️लॉर्ड सभा की भूमिका की आलोचना
अनेक विद्वानों ने विभिन्न आधारों पर लॉर्ड सभा की भूमिका की आलोचना
की है। इसकी आलोचना का प्रमुख आधार इसका वंशानुगत संगठन है। वर्तमान समय
में ब्रिटिश राजनीतिक व्यवस्था में लॉर्ड सभा की सबसे अधिक आलोचना की जाती
है।
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| ब्रिटिश लॉर्ड सभा की भूमिका का मूल्यांकन |
ब्रिटेन का मजदूर दल 1907 से ही यह मत व्यक्त करता रहा है कि लॉर्ड सभा की कोई आवश्यकता नहीं है।
जे.आर. क्लाइन्स के अनुसार, “लॉर्ड सभा एक ऐसी संस्था है जिसे सही तरीके से सुधारा नहीं
जा सकता, और यदि इसे सुधारा नहीं
जा सकता तो इसे समाप्त कर देना चाहिए।”
इस प्रकार कुछ लोगों का मानना है कि लॉर्ड सभा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, जबकि कुछ लोग इसे बनाए
रखने के पक्ष में हैं, लेकिन वे इसके वर्तमान स्वरूप में नहीं बल्कि इसमें सुधार चाहते हैं।
लॉर्ड सभा की प्रमुख आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं—
1. अलोकतांत्रिक संस्था-
इसकी संरचना का आधार वंशानुगत है। इसी कारण सिडनी और बैट्रिस
वेब ने कहा है कि “लॉर्ड सभा के निर्णय उसकी संरचना से ही प्रभावित होते हैं। यह सभी निर्मित
प्रतिनिधि संस्थाओं में सबसे खराब है, क्योंकि इसमें श्रमिक वर्ग, दुकानदार, क्लर्क और अध्यापक वर्ग का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, न ही उस आधी आबादी का जो
महिला वर्ग है,
और न ही कला, विज्ञान या साहित्य का।” संरचना की दृष्टि से
दोषपूर्ण होने के कारण लास्की ने इसे “समय के विरुद्ध एक ऐसी रचना बताया है जिसका समर्थन नहीं
किया जा सकता।”
2. धनी वर्ग का प्रतिनिधित्व-
लॉर्ड सभा को अक्सर धनिकों की सभा (Plutocratic House) कहा जाता है। कार्टर
आदि के अनुसार,
“लॉर्ड सभा केवल
संपत्ति और विशेषाधिकारों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करती, बल्कि वास्तव में यह
स्वयं संपत्ति और विशेषाधिकारों का केंद्र है।” अपने प्रतिनिधित्व के स्वरूप के कारण इस सभा ने अक्सर
प्रगतिशील और जनहितकारी नीतियों का विरोध किया है।
3. अनुदार दल का स्थायी प्रभाव-
इस संस्था के अधिकांश सदस्य अनुदार दल से जुड़े होते हैं या उससे सहानुभूति
रखते हैं। इसी कारण कार्टर ने कहा है कि “आम चुनावों में चाहे किसी भी दल को बहुमत मिले, लॉर्ड सभा पर अनुदार दल
का प्रभाव हमेशा बना रहता है।”
4. सदस्यों की उदासीनता तथा दोषपूर्ण प्रक्रिया-
इस सदन में गणपूर्ति मात्र 8 सदस्यों की होती है। कार्यवाही के लिए कोई निश्चित नियम नहीं हैं और अध्यक्ष
के अधिकार भी सीमित होते हैं। इसी कारण इसे ‘गड़बड़-घोटाला सदन’ या उदासीन सदन भी कहा जाता है।
5. द्वितीय सदन के रूप में अनुपयोगिता-
1911 और 1949 के संसदीय अधिनियमों के
बाद कानून निर्माण के क्षेत्र में इसकी भूमिका अत्यंत सीमित हो गई है। अब यह केवल
विलंब करने वाली संस्था के रूप में रह गई है।
6. विधायी और कार्यकारी शक्ति की निरर्थकता-
1911
और 1949 के संसदीय अधिनियमों के
परिणामस्वरूप इसकी विधायी शक्ति बहुत कमजोर हो गई है। इसी तरह मंत्रिमंडल पर भी
इसका कोई नियंत्रण नहीं है, क्योंकि मंत्रिमंडल केवल लोकसदन के प्रति उत्तरदायी होता है।
🌟 लॉर्ड सभा की उपयोगिता और महत्व
यद्यपि लॉर्ड सभा की वंशानुगत संरचना, इसकी कार्य-प्रणाली तथा इसकी सीमित भूमिका के
आधार पर विद्वानों ने इसे अनावश्यक और विलंबकारी सदन कहा है, फिर भी यह सदन कई
महत्वपूर्ण कार्य करता है।
1. लोकसदन की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश-
लोकसदन द्वारा यदि कभी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर मनमाने ढंग से कानून बनाए जाते हैं, तो लॉर्ड सभा उस
पर नियंत्रण का कार्य करती है। यह लोकसदन की विधि-निर्माण में एकाधिकार प्रवृत्ति
पर अंकुश लगाती है।
2. विधेयकों की भाषायी और तकनीकी गुणवत्ता में सुधार-
लोकसदन में समय की कमी, कार्यभार की अधिकता और गिलोटिन जैसी प्रक्रियाओं के कारण कई बार विधेयकों में
भाषायी तथा तकनीकी त्रुटियाँ रह जाती हैं। लॉर्ड सभा में इन
विधेयकों पर विस्तृत विचार करके ऐसी कमियों को दूर किया जाता है। इस भूमिका को
लोकसदन भी स्वीकार करता है।
3. योग्य व्यक्तियों का भंडार-
राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा और चुनावी राजनीति से दूर रहने के कारण इस सदन
में अनेक अनुभवी और योग्य व्यक्तियों को स्थान मिलता है। उनकी विशेषज्ञता का लाभ
देश और व्यवस्था को प्राप्त होता है।
4. ब्रिटिश परंपराओं के अनुरूप सदन-
लॉर्ड सभा ब्रिटिश संवैधानिक इतिहास और परंपराओं का हिस्सा है। यह अतीत से जुड़ी संस्था
है, इसलिए रूढ़िवादी स्वभाव
वाले अंग्रेजों को यह स्वीकार्य लगती है। हैरिसन के अनुसार, “हमारे द्वारा लॉर्ड सभा
को बनाए रखने का एक कारण यह है कि यह राजतंत्र की तरह सदैव से अस्तित्व में रही
है।”
5. शासन व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने में सहायक-
लोकसदन द्वारा अपनाई गई प्रगतिशील नीतियों के प्रति लॉर्ड सभा में उच्च
एवं कुलीन वर्ग की प्रतिक्रिया व्यक्त होती है। इससे नीति-निर्माण में संतुलन
स्थापित होता है और विभिन्न वर्गों के बीच सहमति विकसित करने में सहायता मिलती है।
इससे ब्रिटिश शासन व्यवस्था को स्थायित्व प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त, व्यवस्थापन कार्य में सहयोग, वाद-विवाद की उच्च गुणवत्ता तथा ब्रिटिश राजनीतिक परंपरा के अनुरूप होने के
कारण भी इसकी उपयोगिता को स्वीकार किया जाता है।
🔧 लॉर्ड सभा के सुधार के सुझाव
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि यद्यपि 1911 एवं 1949 के अधिनियमों के द्वारा लॉर्ड सभा की शक्तियाँ काफी सीमित
कर दी गई हैं,
फिर भी यह सदन आज
भी अनेक महत्वपूर्ण कार्य करता है, जिससे इसकी उपयोगिता बनी रहती है। इसकी प्रभावशीलता और
प्रासंगिकता को और बढ़ाने के लिए निम्नलिखित सुधार सुझाव दिए जाते हैं—
1. सदस्यों की संख्या में कमी-
लॉर्ड सभा के सदस्यों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए ताकि इसकी कार्यकुशलता और
निर्णय लेने की क्षमता में सुधार हो सके।
2. वंशानुगत सदस्यता का अंत-
वंश परम्परागत (Hereditary) सदस्यता को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह लोकतांत्रिक
सिद्धांतों के विपरीत है।
3. चयन की नई व्यवस्था-
सदस्यों की नियुक्ति के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचन तथा मनोनयन (Nomination) की मिश्रित प्रणाली अपनाई
जानी चाहिए, जिससे योग्य और अनुभवी
व्यक्तियों को स्थान मिल सके।
4. समान वेतन एवं भत्ते-
लॉर्ड सभा के सदस्यों को लोकसदन के सदस्यों के समान ही वेतन और भत्ते दिए
जाने चाहिए, ताकि उनमें समानता और
उत्तरदायित्व की भावना बनी रहे।
5. गणपूर्ति और कार्यप्रणाली में सुधार-
लॉर्ड सभा की गणपूर्ति संख्या बढ़ाई जानी चाहिए तथा इसकी कार्यवाही का संचालन एक
लोकतांत्रिक और सुव्यवस्थित सदन की तरह किया जाना चाहिए, जिससे इसकी कार्यकुशलता
और गरिमा दोनों में वृद्धि हो सके।
❓ FAQ : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. लॉर्ड सभा क्या है?
यह ब्रिटिश संसद का उच्च सदन है।
2. लॉर्ड सभा की भूमिका क्या है?
यह विधेयकों की समीक्षा और संशोधन का कार्य करती है।
3. क्या लॉर्ड सभा लोकतांत्रिक संस्था है?
आलोचकों के अनुसार यह पूरी तरह लोकतांत्रिक नहीं है।
4. लॉर्ड सभा की मुख्य आलोचना क्या है?
इसका वंशानुगत स्वरूप सबसे बड़ी आलोचना है।
5. क्या लॉर्ड सभा को समाप्त किया जाना चाहिए?
कुछ विद्वान इसे समाप्त करने की बात करते हैं, जबकि कुछ सुधार का समर्थन
करते हैं।
6. लॉर्ड सभा की उपयोगिता क्या है?
यह विधेयकों की गुणवत्ता सुधारती है और संतुलन बनाए रखती है।
7. क्या लॉर्ड सभा सरकार को नियंत्रित कर सकती है?
नहीं, इसका कार्यकारी नियंत्रण सीमित है।
8. 1911 और 1949 के अधिनियम का प्रभाव
क्या पड़ा?
इसकी विधायी शक्तियाँ काफी कम हो गईं।
9. लॉर्ड सभा में कौन सदस्य होते हैं?
यहाँ वंशानुगत, नामांकित और धार्मिक प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
10. लॉर्ड सभा को सुधारने की आवश्यकता क्यों है?
इसे अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावी बनाने के लिए सुधार आवश्यक है।
🧾 निष्कर्ष (Conclusion)
House of Lords एक ऐतिहासिक और परंपरागत संस्था है, जिसकी भूमिका को लेकर
लगातार विवाद और बहस होती रही है। एक ओर इसे अलोकतांत्रिक और सीमित शक्ति
वाली संस्था माना जाता है, वहीं दूसरी ओर यह ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में
संतुलन, विशेषज्ञता और विधायी गुणवत्ता सुधारने का महत्वपूर्ण कार्य
करती है।
इसलिए निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस संस्था को पूरी तरह
समाप्त करने की बजाय इसके व्यापक और लोकतांत्रिक सुधार अधिक उचित और व्यावहारिक
विकल्प हैं।
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