भारत में दलीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं

परिचय - भारत में दलीय व्यवस्था

भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश है, जहाँ शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने में राजनीतिक दलों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भारतीय लोकतंत्र में दलीय व्यवस्था केवल चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकार के गठन, जनमत निर्माण, विपक्ष की भूमिका तथा जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाने का कार्य भी करती है। यही कारण है कि भारत में दलीय व्यवस्था को लोकतांत्रिक शासन की रीढ़ माना जाता है।

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भारत में दलीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की आवश्यकता और भूमिका

आज के समय में शासन की कई प्रकार की व्यवस्थाएँ देखने को मिलती हैं, जिनमें लोकतंत्र सबसे अधिक लोकप्रिय माना जाता है। लोकतंत्र के मुख्यतः दो रूप होते हैं— (1) प्रत्यक्ष लोकतंत्र तथा (2) अप्रत्यक्ष या प्रतिनिधिक लोकतंत्र। जनसंख्या में निरंतर वृद्धि और राज्यों के विशाल क्षेत्रफल के कारण वर्तमान दौर में दुनिया के लगभग सभी देशों में प्रतिनिधिक शासन प्रणाली ही अपनाई गई है। इस व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है और वही प्रतिनिधि शासन संचालन का कार्य करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने में राजनीतिक दलों की भूमिका अत्यंत आवश्यक होती है।

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था जनमत पर आधारित होती है और राजनीतिक दल जनमत निर्माण तथा उसकी अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम माने जाते हैं। लोकतंत्र में केवल सत्तारूढ़ दल ही नहीं बल्कि विपक्षी दल भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण होते हैं। विपक्ष सरकार को नियंत्रित और मर्यादित रखने का कार्य करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि आधुनिक राजनीतिक जीवन में दलीय संगठनों का विशेष महत्त्व है। इनके बिना लोकतंत्र की सफलता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए बर्क ने सही कहा था कि दल लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य हैं।

राजनीतिक दल और दलीय व्यवस्था लोकतंत्र के लिए निम्न कारणों से महत्त्वपूर्ण मानी जाती है

  • 1.      जनता में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न करना।
  • 2.      जनप्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
  • 3.      जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाना।
  • 4.      सरकार का गठन करना।
  • 5.      सरकार की नीतियों की समीक्षा और आलोचना करना।
  • 6.      राष्ट्रीय भावना को मजबूत बनाना।
  • 7.      योग्य व्यक्तियों को शासन में भागीदारी देना।
  • 8.      बड़े चुनाव क्षेत्रों के संचालन में सहायक होना।
  • 9.      नवस्थापित लोकतंत्रों के लिए उपयोगी सिद्ध होना।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत की संसदीय एवं लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में राजनीतिक दलों और दलीय व्यवस्था की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

भारतीय दल प्रणाली की विशेषताएं

भारतीय दलीय प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. बहुदलीय व्यवस्था-

भारत में बहुदलीय प्रणाली प्रचलित है। 15वीं लोकसभा में 20 से अधिक तथा विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में 50 से अधिक राजनीतिक दल मौजूद थे। 1988 तक प्रायः एक ही राजनीतिक दल का प्रभुत्व बना रहा, लेकिन 1989 से लेकर 2014 तक किसी एक दल या गठबंधन का पूर्ण वर्चस्व नहीं रहा। हालांकि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में एक दल की मजबूत स्थिति देखने को मिली, फिर भी भारत की मूल व्यवस्था बहुदलीय ही बनी हुई है। इसी कारण कई बार चुनावों में खंडित जनादेश प्राप्त होता है और गठबंधन सरकारों का गठन करना पड़ता है।

2. राजनीतिक दलों में विभाजन और अस्थिरता-

भारतीय राजनीति में दलों के टूटने, बिखरने और विलय की स्थिति लगातार बनी रही है। कांग्रेस पार्टी का कई बार विभाजन हुआ। जनता पार्टी भी समय के साथ अनेक भागों में बंट गई। जनता दल का गठन और बाद में उसका विघटन भी इसी अस्थिरता का उदाहरण है। आज स्थिति यह है कि नए दल बनते हैं और कुछ समय बाद उनका विलय या विभाजन हो जाता है। इससे दलीय स्थिरता प्रभावित होती है।

3. आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन की कमी-

अधिकांश भारतीय राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव देखने को मिलता है। दलों के अंदर निर्णय कुछ सीमित नेताओं द्वारा लिए जाते हैं। दलों की आय-व्यय व्यवस्था भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं होती। चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर सुधार के प्रयास किए हैं, लेकिन वास्तविक सुधार राजनीतिक दलों की इच्छा पर निर्भर करता है।

4. मजबूत लेकिन बंटा हुआ विपक्ष-

भारत में विपक्ष कई बार संख्या की दृष्टि से मजबूत रहा है, लेकिन विभाजन और आपसी मतभेदों के कारण वह प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाया। विभिन्न लोकसभाओं में कांग्रेस और भाजपा प्रमुख विपक्षी दल रहे हैं, परंतु विपक्ष की एकता का अभाव उसकी कमजोरी बना रहा।

5. आंतरिक गुटबंदी-

लगभग सभी राजनीतिक दल गुटबंदी की समस्या से प्रभावित हैं। प्रत्येक दल में सत्ता पक्ष और असंतुष्ट गुट मौजूद रहते हैं। इन गुटों के बीच मतभेद बने रहते हैं, जिससे दलों की एकजुटता कमजोर होती है।

6. छोटे दलों का दबाव समूह जैसा स्वरूप-

भारत के कई छोटे राजनीतिक दल सीमित क्षेत्र और प्रभाव वाले हैं। ये दल अक्सर बड़े दलों के साथ गठबंधन करके अपने हितों की पूर्ति करने का प्रयास करते हैं। कई बार इनका स्वरूप दबाव समूह जैसा दिखाई देता है

7. नीतियों और कार्यक्रमों में स्पष्ट अंतर का अभाव-

भारतीय राजनीतिक दलों की नीतियों और कार्यक्रमों में स्पष्ट अंतर कम दिखाई देता है। सत्ता प्राप्ति के लिए दल वैचारिक समझौते करते रहते हैं। कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल वैचारिक विरोध के बावजूद गठबंधन करते रहे हैं।

8. क्षेत्रीय दलों की बढ़ती शक्ति-

1989 के बाद भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। ये दल अपने राज्यों में सत्ता में आने के साथ-साथ केंद्र सरकार में भी भागीदारी निभाने लगे। कई बार केंद्र की सरकारें क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर निर्भर रही हैं।

9. जातिवादी नेतृत्व का बढ़ता प्रभाव-

1990 के बाद भारतीय राजनीति में जातिगत आधार पर नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा है। अब राजनीतिक दलों में जातीय समीकरणों को विशेष महत्त्व दिया जाता है। नेतृत्व चयन में जातिगत प्रभाव एक महत्त्वपूर्ण कारक बन गया है।

10. कथनी और करनी में अंतर-

राजनीतिक दलों और नेताओं की बातों तथा कार्यों में अंतर अक्सर देखने को मिलता है। सत्ता प्राप्ति की राजनीति के कारण जनता का विश्वास धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, जो लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

11. अवसरवादिता और अपराधी तत्वों की भागीदारी-

राजनीतिक दल कई बार चुनाव जीतने की संभावना को प्राथमिकता देते हैं, जिसके कारण धनबल और बाहुबल वाले व्यक्तियों को उम्मीदवार बनाया जाता है। इससे राजनीति में अपराधी तत्वों की भागीदारी बढ़ी है।

12. साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीयता पर आधारित दल-

भारत में कई राजनीतिक दल धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर बने हुए हैं। क्षेत्रीय और साम्प्रदायिक दलों का प्रभाव समय के साथ बढ़ता गया है और वे राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

13. वंशवाद और परिवारवाद की प्रवृत्ति-

भारतीय राजनीति में परिवारवाद एक बड़ी समस्या बन चुका है। कई दलों में नेतृत्व एक ही परिवार तक सीमित दिखाई देता है। नेता का चयन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय पारिवारिक प्रभाव के आधार पर होता है। इससे लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुँचता है।

अंत में कहा जा सकता है कि भारतीय दलीय व्यवस्था में अनेक खूबियाँ और कमियाँ दोनों मौजूद हैं। राजनीतिक दल लोकतंत्र की रीढ़ हैं, लेकिन उन्हें अधिक पारदर्शी, अनुशासित और जनहितकारी बनाने की आवश्यकता है।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. भारत में दलीय व्यवस्था क्या है?

भारत में दलीय व्यवस्था से आशय राजनीतिक दलों की उस प्रणाली से है जिसके माध्यम से लोकतांत्रिक शासन संचालित किया जाता है।

2. भारतीय दलीय प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

भारतीय दलीय प्रणाली की सबसे प्रमुख विशेषता बहुदलीय व्यवस्था है।

3. भारत में बहुदलीय व्यवस्था क्यों अपनाई गई है?

भारत की विशाल जनसंख्या, विविध संस्कृति और अलग-अलग क्षेत्रीय हितों के कारण बहुदलीय व्यवस्था विकसित हुई।

4. भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की क्या भूमिका है?

विपक्ष सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है तथा उसे नियंत्रित और जवाबदेह बनाए रखता है।

5. क्षेत्रीय दलों का भारतीय राजनीति में क्या महत्त्व है?

क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं और कई बार केंद्र सरकार के गठन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

6. भारतीय राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी क्यों मानी जाती है?

अधिकांश दलों में निर्णय कुछ नेताओं तक सीमित रहते हैं और सामान्य कार्यकर्ताओं की भागीदारी कम होती है।

7. भारत में दलीय व्यवस्था की मुख्य कमियाँ क्या हैं?

गुटबंदी, परिवारवाद, अवसरवादिता, भ्रष्टाचार तथा अपराधीकरण इसकी प्रमुख कमियाँ हैं।

8. भारतीय राजनीति में परिवारवाद का क्या प्रभाव पड़ता है?

परिवारवाद के कारण योग्य और नए नेताओं को आगे आने का अवसर कम मिल पाता है।

9. भारत में कौन-कौन से प्रमुख राष्ट्रीय दल हैं?

भारतीय जनता पार्टी (BJP), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), बहुजन समाज पार्टी (BSP) आदि प्रमुख राष्ट्रीय दल हैं।

10. क्या भारतीय दलीय व्यवस्था लोकतंत्र के लिए आवश्यक है?

हाँ, राजनीतिक दल लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार हैं क्योंकि इनके माध्यम से जनता की भागीदारी शासन में सुनिश्चित होती है।

निष्कर्ष

अंततः कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र की सफलता में राजनीतिक दलों और दलीय व्यवस्था की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत में दलीय व्यवस्था की विशेषताएं भारतीय राजनीति को विविधता और प्रतिनिधित्व प्रदान करती हैं, वहीं इसकी कुछ कमियाँ भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।

बहुदलीय व्यवस्था, क्षेत्रीय दलों का प्रभाव, विपक्ष की भूमिका तथा लोकतांत्रिक भागीदारी भारतीय राजनीति को मजबूत बनाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल पारदर्शिता, अनुशासन और जनहित को प्राथमिकता दें, ताकि लोकतंत्र और अधिक सशक्त बन सके।

आशा है कि यह जानकारी आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी। यदि आपको यह जानकारी पसंद आई हो तो इसे अपने मित्रों के साथ अवश्य साझा करें।

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