परिचय
ब्रिटिश संविधान विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और अनोखे संविधानों में से एक माना
जाता है। यह केवल एक लिखित दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि कई वर्षों के ऐतिहासिक विकास, परंपराओं, न्यायिक निर्णयों और संवैधानिक
अभिसमयों का परिणाम है। यही कारण है कि इसे समझना थोड़ा अलग और रोचक बन
जाता है।
दुनिया के कई देशों जैसे भारत और अमेरिका के संविधान एक निश्चित समय पर बनाए गए थे, लेकिन ब्रिटेन का संविधान धीरे-धीरे विकसित हुआ है। इसमें समय के साथ आवश्यकतानुसार बदलाव किए गए हैं, जिससे यह आज भी प्रासंगिक और प्रभावशाली बना हुआ है।
ब्रिटिश संविधान की सबसे खास बात यह है कि यह लचीला, अलिखित और परंपराओं पर आधारित
है। इसके साथ ही इसमें संसदीय लोकतंत्र, विधि का शासन और संसदीय प्रभुसत्ता
जैसी महत्वपूर्ण विशेषताएँ भी शामिल हैं, जो इसे अन्य देशों के संविधानों से अलग बनाती हैं।
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| ब्रिटिश संविधान की प्रमुख विशेषताएँ |
इस लेख में हम ब्रिटिश संविधान की प्रमुख विशेषताओं को परिभाषा और आसान भाषा
में विस्तार से समझेंगे, ताकि यह विषय छात्रों और सामान्य पाठकों दोनों के लिए उपयोगी साबित हो सके।
ब्रिटिश संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
ब्रिटिश संविधान की विशेषताएँ अत्यंत रोचक और विशिष्ट हैं।
इसे निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है-
1. विकसित
संविधान (Evolutionary
Constitution)
ब्रिटिश संविधान किसी निश्चित समय पर लिखित रूप
में नहीं बनाया गया था। यह धीरे-धीरे विकसित हुआ है। ब्रिटिश इतिहास में राजनीतिक
व्यवस्था समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही। उदाहरण के लिए, 9वीं सदी में राजतंत्र
की स्थापना हुई, 13वीं सदी में संसद
का औपचारिक रूप से आरंभ हुआ, और 17वीं सदी में संसदीय प्रभुसत्ता
स्थापित हुई। इस क्रम में ब्रिटिश संविधान ने लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाया।
ब्रिटेन का संविधान किसी विशेष सभा द्वारा नहीं बनाया गया जैसा अमेरिका या भारत में हुआ और न ही यह किसी एक दस्तावेज़ में संकलित है। यह
संविधान अनेक स्रोतों— कानून, परंपराएँ, न्यायिक निर्णय और संवैधानिक प्रथाओं के सम्मिश्रण से बना है।
2. अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)
ब्रिटिश संविधान का अधिकांश भाग लिखित नहीं है।
यह परंपराओं, रीति-रिवाजों और
प्रथाओं पर आधारित है। न्यूमैन के अनुसार, ब्रिटिश संविधान की विशेषता यह है कि इसमें कई नियम और
प्रावधान केवल परंपराओं पर आधारित हैं, जिन्हें वर्षों के अनुभव और व्यवहार ने स्थापित किया है।
3. एकात्मक संविधान (Unitary Constitution)
ब्रिटेन का संविधान एकात्मक है। इसका मतलब यह है कि
सत्ता का केंद्र एक ही स्थान—लंदन—में है। प्रशासनिक दृष्टि से स्थानीय निकाय बनाए
गए हैं और उन्हें कुछ अधिकार दिए गए हैं, लेकिन उनकी शक्ति केवल केंद्र सरकार से आती है, संविधान से नहीं। इसलिए, स्थानीय प्रशासन केंद्र सरकार पर
निर्भर करता है।
4. सीमित रूप में शक्ति
का विभाजन (Quasi-Separation of
Powers)
ब्रिटेन में शक्ति का पूर्ण पृथक्करण नहीं है। मॉण्टेस्क्यू
की दृष्टि से सत्ता का विभाजन होना चाहिए था, लेकिन ब्रिटेन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका
घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं। केवल न्यायपालिका स्वतंत्र है। संसद और
मंत्रिमंडल के बीच यह निकटता संसदीय शासन की प्रकृति को दर्शाती है।
5. लचीला और
सुपरिवर्तनशील संविधान (Flexible
Constitution)
ब्रिटिश संविधान में कानून बनाने और संविधान संशोधन
की प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं है। संसद साधारण बहुमत से न केवल कानून बना सकती
है, बल्कि संविधान में
भी संशोधन कर सकती है। इसी लचीलापन ने ब्रिटेन को कई संवैधानिक संकटों का
सामना करने और उन्हें हल करने में सक्षम बनाया है।
6. सिद्धांत और व्यवहार
में अंतर (Distinction between
Principles and Reality)
ब्रिटिश संविधान में सिद्धांत और व्यवहार में
अंतर पाया जाता है। उदाहरण के लिए, सैद्धांतिक रूप से ब्रिटेन में निरंकुश राजतंत्र था, लेकिन व्यवहार में संसदीय लोकतंत्र कार्यरत है।
इसी प्रकार, सिद्धांततः संसद
मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखती है, लेकिन वास्तविकता
में मंत्रिमंडल संसद को नियंत्रित करता है।
7. विधि का शासन (Rule of Law)
ब्रिटिश संविधान में कानून सर्वोपरि है। इसका मतलब
है कि शासन का संचालन किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि कानून के अनुसार होता है। कानून सभी के
लिए समान है और कोई भी इसके ऊपर नहीं है।
8. प्राचीनतम
लोकतांत्रिक संविधान (Oldest
Democratic Constitution)
ब्रिटेन का संविधान दुनिया का सबसे पुराना लोकतांत्रिक
संविधान माना जाता है। राजनीतिक स्थिरता और नागरिकों की जागरूकता ने यहाँ लोकतंत्र
को सुरक्षित रखा। राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद लोकतंत्र बनी रही।
9. संसदात्मक लोकतंत्र
(Parliamentary
Democracy)
ब्रिटेन में संसदात्मक कार्यपालिका है, जो अध्यक्षात्मक कार्यपालिका से भिन्न है।
ब्रिटिश मंत्रिमण्डल के सदस्य संसद के भी सदस्य होते हैं और उसी के प्रति
उत्तरदायी होते हैं। शासन हाथों में है तथा राजा नाममात्र का शासक है। संसदात्मक
शासन के तीनों लक्षण ब्रिटिश शासन वास्तविक सत्ता उनके ही के अन्तर्गत पूर्णतया
विद्यमान है। यथा-
(i) दोहरी कार्यपालिका- ब्रिटेन में दोहरी
कार्यपालिका है। वहाँ सम्राट औपचारिक तथा नाममात्र की कार्यपालिका का रूप है, और प्रधानमंत्री व उसका मंत्रिमण्डल वास्तविक
कार्यपालिका का रूप है।
(ii) कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका
में घनिष्ठ सम्बन्ध- इंग्लैण्ड में कार्यपालिका का निर्माण व्यवस्थापिका के
सदस्यों से किया गया है और कार्यपालिका के सदस्य जहाँ संसद की बैठकों में शरीक
होते हैं एवं कानून निर्माण के मुख्य कर्ताधर्ता होते हैं, वहीं ससंद भी कार्यपालिका पर अपने अविश्वास
प्रस्ताव एवं प्रश्नों आदि के द्वारा कार्यपालिका को नियंत्रित करती है।
(iii) कार्यकाल की
अनिश्चितता- ब्रिटेन में कार्यपालिका के कार्यकाल की निश्चितता, संसदीय बहुमत पर निर्भर करती है । संसदीय बहुमत
पर आधारित होने के कारण ब्रिटेन में हमेशा अनिश्चितता की तलवार कार्यपालिका की
गर्दन से सटी रहती है। अत: स्पष्ट है कि ब्रिटेन का संविधान संसदात्मक
प्रजातंत्रात्मक संविधान है।
10. संवैधानिक अभिसमयों
पर आधारित (Conventions)
ब्रिटिश संविधान मुख्यतः संवैधानिक अभिसमयों
और परंपराओं पर आधारित है। लिखित संविधान की कमी के कारण प्रथाएँ, रीति-रिवाज और परंपराएँ संविधान का महत्वपूर्ण
हिस्सा बन गई हैं।
11. संसदीय प्रभुसत्ता (Supremacy of Parliament)
ब्रिटिश संसद सर्वोच्च है। वैधानिक दृष्टि से उसकी शक्ति
असीमित है। वह किसी भी विषय पर कानून बना सकती है और संविधान में संशोधन कर
सकती है। हालांकि व्यवहार में लोकमत, अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता इस शक्ति पर प्रभाव
डालते हैं।
12. संयोग और विवेक का
परिणाम (Result of Chance
and Wisdom)
लाइटन स्ट्रैची (Lytton Strachey) के शब्दों में, "ब्रिटिश संविधान
संयोग और विवेक का शिशु है।" इसके विकास में दोनों प्रकार के तत्त्वों का
योगदान रहा है। यथा-
(i) संयोग के तत्त्व- ब्रिटिश संविधान के
विकास में संयोग के तत्त्वों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उदाहरण के लिए, संसद का द्वि-सदनीय रूप संयोग की घटनाओं की ही
उपज है। इसी प्रकार मंत्रिपरिषद् की वर्तमान स्थिति भी संयोग की घटनाओं के कारण ही
हुई है।
(ii) विवेक के तत्त्व- ब्रिटेन के संविधान
में संस्थाओं तथा उनकी शक्तियों में विवेक के तत्त्वों की प्रधानता रही है।
यथा-लोक सदन का लोकतंत्रीकरण और लॉर्ड सभा की शक्तियों के ह्यस में विवेक के
तत्त्वों का योगदान है। इसके अन्तर जहाँ 1832, 1867 तथा 1884 के अधिनियमों ने लोक
सदन का लोकतंत्रीकरण किया है, वहाँ 1911 और 1949 के संविधान संशोधन
ने लॉर्ड सभा की शक्तियों का हास किया है।
13. मिश्रित संविधान (Mixed Constitution)
ब्रिटेन के संविधान में तीन प्रकार की शासन व्यवस्थाएँ— राजतंत्र, कुलीनतंत्र और प्रजातंत्र— एक साथ विद्यमान हैं। यह इसे एक मिश्रित संविधान
बनाता है।
14. न्यायपालिका की
स्वतंत्रता (Judicial
Independence)
संवैधानिक सुधार कानून 2005 से पहले न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से
पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थी। लॉर्ड चांसलर दोनों का सदस्य होता था। 2005 के बाद ब्रिटिश
न्यायपालिका को पूरी तरह स्वतंत्र कर दिया गया, और सर्वोच्च न्यायालय तथा अन्य न्यायालयों की स्थापना की
गई। अब न्यायपालिका पूर्णतया स्वतंत्र है और लॉर्ड चांसलर की
न्यायिक भूमिका समाप्त हो गई है।
निष्कर्ष
ब्रिटिश संविधान का इतिहास, विकास और संरचना इसे विश्व के सबसे अद्वितीय और प्रभावशाली संवैधानिक
ढाँचों में से एक बनाते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएँ— विकसित, अलिखित, एकात्मक, लचीला, और संसदीय लोकतंत्र ब्रिटेन को स्थिर और लोकतांत्रिक
बनाए रखती हैं। यह संविधान न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आधुनिक लोकतंत्रों
के लिए प्रेरणास्त्रोत भी है। आशा हैं कि हमारे द्वारा
दी गयी जानकारी आपको काफी पसंद आई होगी। यदि जानकारी आपको पसन्द आयी हो तो इसे
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