परिचय (Introduction)
ब्रिटिश संविधान विश्व के सबसे प्राचीन और विशिष्ट संविधानों में से एक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक समय पर योजनाबद्ध रूप से तैयार नहीं किया गया, जैसा कि भारत, अमेरिका या सोवियत रूस के संविधानों में देखा गया। ब्रिटिश संविधान का निर्माण लंबे समय तक चले ऐतिहासिक घटनाओं, परंपराओं और संवैधानिक सुधारों के माध्यम से हुआ।
इसी कारण इसे
विद्वानों ने कहा है कि “ब्रिटिश संविधान
विकास का परिणाम है, न कि रचना”। प्रसिद्ध इतिहासकार लाइटन
स्ट्रेची के अनुसार यह संविधान “विवेक और संयोग की संतान (Child of Wisdom and
Chance)” है। इसका अर्थ यह
है कि संविधान का विकास दो प्रकार के तत्वों— संयोग (अचानक घटनाएँ और परिस्थितियाँ) और विवेक
(सोच-समझकर किए गए सुधार और कानून) के सम्मिलित योगदान से हुआ।
ब्रिटिश संविधान का यह
विकास प्रक्रिया इसे अनूठा बनाती है। न तो इसे किसी एक सभा ने लिखित रूप में बनाया, और न ही यह किसी एक समय
में पूर्ण हुआ। यह निरंतर बदलती राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक आवश्यकताओं और
जनता की जागरूकता के अनुसार विकसित होता रहा।
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| ब्रिटिश संविधान संयोग और विवेक का शिशु |
इस लेख में हम
विस्तार से समझेंगे कि कैसे ब्रिटिश संविधान ने ऐतिहासिक घटनाओं और विवेकपूर्ण
सुधारों के माध्यम से आकार लिया, और इसे विश्व के
सबसे प्रभावशाली और स्थायी संविधानों में क्यों माना जाता है।
ब्रिटिश संविधान :
संयोग और विवेक का परिणाम
ब्रिटिश संविधान
के इन दोनों तत्वों को हम निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत विस्तार से समझ सकते हैं-
(A) संयोग का शिशु (Child of
Chance or Accident)
परिभाषा: संयोग का शिशु होने का
अर्थ है कि संविधान का विकास अचानक हुई ऐतिहासिक घटनाओं, परिस्थितियों और
अप्रत्याशित बदलावों के कारण हुआ हो।
ब्रिटिश संविधान
के विकास में कई ऐतिहासिक घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिन्हें निम्न बिंदुओं
में समझा जा सकता है:
1. राजपद का प्रादुर्भाव एवं उसका विकास
एंग्लो-सेक्सन काल में इंग्लैंड में राजतंत्र
की शुरुआत हुई। जब शक्तिशाली समूहों ने कमजोर समूहों को अपने अधीन कर लिया, तब एक शक्तिशाली राजा का
उदय हुआ। यह राजा कानून बनाने वाला, प्रशासन चलाने वाला और न्याय देने वाला तीनों कार्य करता
था।
राजा का पद कभी वंशानुगत
होता था और कभी चुनाव द्वारा तय किया जाता था। राजा की सहायता के लिए एक सभा होती
थी जिसे “विटनेजमोट” (बुद्धिमानों की सभा) कहा
जाता था। यह सभा राजा के निर्णयों पर प्रभाव डालती थी और उसके निरंकुश व्यवहार को
सीमित करती थी।
इसके बाद विलियम
ने विटनेजमोट को समाप्त कर “मैग्नम काउन्सीलियम” की स्थापना की और साथ ही एक छोटी समिति “क्यूरिया रेजिस” बनाई। समय के साथ यह
व्यवस्था और विकसित हुई और “प्रिवी काउन्सिल” का गठन हुआ।
आगे चलकर 17वीं और 18वीं शताब्दी में इसी
प्रिवी काउन्सिल से मंत्रिपरिषद और कैबिनेट प्रणाली का विकास
हुआ, जो आज भी ब्रिटेन की शासन
व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब राजा जॉन
के अत्याचारी व्यवहार के खिलाफ सामंतों (बैरनों) ने विद्रोह किया, तो 1215 में उसे झुकना पड़ा। फलस्वरूप
'मैग्नाकार्टा' अधिकार पत्र सामने आया, जिससे निरंकुश राजतंत्र
एक संवैधानिक व सीमित राजतन्त्र के रूप में विकसित हुआ, जो आज भी विद्यमान है।
2. द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका का विकास
ब्रिटेन में
द्विसदनात्मक व्यवस्था (दो सदनों वाली संसद) भी संयोग का परिणाम है। 13वीं सदी के
अन्तिम वर्षों में इंग्लैण्ड का राजकोष खाली हो गया था। ऐसी स्थिति में सन् 1295 में सम्राट एडवर्ड
प्रथम को कर लगाने की आवश्यकता हुई, इसलिए उसने विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को बुलाया। इस
सभा में तीन वर्ग थे—
(क) सामंत (Nobles), (ख) धर्माधिकारी (Clergy) (ग) नगरों के प्रतिनिधि (Common people)
सिद्धांत रूप में
तीन सदन बनने चाहिए थे, लेकिन
परिस्थितियों के कारण दो ही सदन बने।
(क) उच्च वर्ग
(सामंत + उच्च धर्माधिकारी) → लॉर्ड सभा (House of Lords)
(ख) सामान्य वर्ग
(नगरों के प्रतिनिधि) → कॉमन सभा (House of Commons)
इस प्रकार वर्गीय
हितों के आधार पर दो स्पष्ट वर्ग बने और तब द्विसदनात्मक व्यवस्थापिका
बनी। प्रथम वर्ग ने लॉर्ड सभा का निर्माण किया एवं द्वितीय सदन ने लोकसदन (कॉमन
सभा) का निर्माण किया। इस प्रकार ब्रिटेन में
द्विसदनात्मक संसद की स्थापना हुई।
3. प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रिमण्डल की अध्यक्षता
हनोवेरियन वंश के समय एक
महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। इस वंश के राजा अंग्रेजी भाषा नहीं जानते थे, इसलिए उन्होंने
मंत्रिमंडल की बैठकों में भाग लेना बंद कर दिया। इस स्थिति में 1721 में मंत्रिमंडल की
अध्यक्षता का कार्य “राजकोष के प्रथम
लॉर्ड” को दिया गया। आगे चलकर
यही पद प्रधानमंत्री कहलाया।
सर राबर्ट
वाल्पोल राजकोष के प्रथम
लॉर्ड या प्रथम प्रधानमंत्री बने। इस प्रकार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद का विकास
हुआ तथा प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल की अध्यक्षता करता आ रहा है।
4. संसद की
सर्वोच्चता की स्थापना-
ब्रिटेन में
द्विसदनात्मक संसदीय व्यवस्था के विकास के साथ-साथ संसद की शक्तियों में वृद्धि भी
धीरे-धीरे हुई है। इस सम्बन्ध में एडवर्ड प्रथम का शासन काल अति महत्त्वपूर्ण
है, उसने अपने काल में संसद
की निम्नलिखित माँगों को स्वीकार कर लिया-
(i) संसद की अनुमति के बिना
कोई नया कर नहीं लगाया जाएगा।
(ii) मंत्रियों की नियुक्ति
में संसद की भूमिका होगी।
(iii) संसद आयुक्तों की
नियुक्ति कर बजट की जाँच कर सकेगी।
(iv) मंत्री अपने कार्यों के
लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होंगे। संसद के नये सत्र के
प्रारम्भ होने से पहले मंत्री लोग अपना त्यागपत्र देंगे और अपने विरुद्ध सब
शिकायतों का उत्तर देंगे।
अतः स्पष्ट है कि
इस काल में संसद को वित्त पर तथा मंत्रिमण्डल पर नियंत्रण की शक्तियाँ
प्राप्त हो गई और आगे चलकर लंकास्ट्रियन राज्यकाल (1399 में 1485)
से संसद की सर्वोच्चता की स्थापना हो गई।
5. प्रधानमंत्रीय शासन का विकास
19वीं सदी में मताधिकार का
विस्तार हुआ, जिससे जनता की भागीदारी
बढ़ी। राजनीतिक दलों के विकास ने अनुशासन और संगठन को मजबूत किया।
इससे मंत्रिमंडल
को जनसमर्थन मिला और प्रधानमंत्री की स्थिति सबसे मजबूत हो गई। द्वितीय विश्व
युद्ध के समय प्रधानमंत्री की शक्ति इतनी बढ़ गई कि इसे “प्रधानमंत्री शासन” कहा जाने लगा।
6. मंत्रिमण्डल के
सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धान्त का विकास-
हनोवेरियन काल में प्रधानमंत्री
द्वारा मंत्रिमण्डल की अध्यक्षता करने की परम्परा के प्रादुर्भाव के साथ-साथ ही एक
अय संवैधानिक परम्परा का विकास हुआ, वह है- मंत्रिमण्डल के सामूहिक उत्तरदायित्व को परम्परा।
सन् 1742 में बहुमत का विश्वास खो देने के कारण प्रधानमंत्री सर राबर्ट वाल्पोल
और उसके मंत्रिमण्डल को त्यागपत्र देना पड़ा। इसी प्रकार सन् 1782 में भी नार्थ
मंत्रिमण्डल ने त्याग पत्र दिया, तभी से इंग्लैण्ड के संविधान में सामूहिक उत्तरदायित्व की
परम्परा चल पड़ी जो अव तक चली आ रही है।
(B) विवेक का शिशु (Child of
Wisdom)
परिभाषा: विवेक का शिशु होने का
अर्थ है कि संविधान का विकास सोच-समझकर बनाए गए कानूनों और सुधारों के माध्यम से
हुआ हो।
ब्रिटिश संविधान
के निर्माण एवं विकास में ऐतिहासिक घटनाओं के योग के साथ-साथ लिखित प्रलेखों का भी
योगदान रहा है,
जिन्हें इन
बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है-
1. संवैधानिक राजतंत्र से लोकतंत्र की स्थापना
ब्रिटेन में
लोकतंत्र की स्थापना तीन महत्वपूर्ण दस्तावेजों के कारण हुई:
1215 – मैग्नाकार्टा
1628 – अधिकार याचिका (Petition of Right)
1689 – अधिकार पत्र (Bill of Rights)
इन दस्तावेजों ने
राजा की शक्ति को सीमित किया और जनता के अधिकारों को मजबूत किया।
2. वयस्क मताधिकार और निर्वाचन सुधार
1832,
1867, 1884, 1918 और 1929 के सुधार अधिनियमों ने
मताधिकार का विस्तार किया और अंततः वयस्क मताधिकार स्थापित किया।
1872
→ गुप्त मतदान
प्रणाली शुरू हुई
1948
→ बहु-मतदान समाप्त
किया गया
सभी निर्वाचन
क्षेत्र एक सदस्यीय बनाए गए। इससे लोकतंत्र और अधिक मजबूत हुआ।
3. कॉमन सभा की श्रेष्ठता
1911 और 1949 के संसदीय अधिनियमों ने लॉर्ड
सभा की शक्तियाँ कम कर दीं। अब कॉमन सभा (House of Commons) बिना लॉर्ड सभा की अनुमति
के भी वित्तीय और सामान्य विधेयक पारित कर सकती है।
4. पीयरेज अधिनियम (Peerage
Acts)
सन् 1958 के पीयरेज
अधिनियम के आधार पर 'आजीवन पीयरों' और 'महिला पीयरों' की व्यवस्था की गई तथा
1963 के 'पीयरेज अधिनियम के आधार
पर व्यवस्था की गई कि कोई वंशानुगत पीयर चाहे तो पद त्याग कर सकता है । सन्
2000 के ‘पीयरेज अधिनियम’ में वंशानुगम पीयर की व्यवस्था बिलकुल समाप्त
कर दी गई। वर्तमान के वंशानुगत पीयर जीवन पर्यन्त पीयर बने रहेंगे। लेकिन उनके
उत्तराधिकारी को लॉर्ड सभा को सदस्यता प्राप्त नहीं होगी। इससे लॉर्ड सभा अधिक
आधुनिक और लोकतांत्रिक बनी।
निष्कर्ष
उपरोक्त विवेचन
से यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश संविधान किसी एक समय में बनाया गया दस्तावेज़
नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर
विकसित होने वाली प्रणाली है।
इसका निर्माण दो
मुख्य तत्वों- संयोग और विवेक के आधार पर हुआ है। एक ओर ऐतिहासिक
घटनाओं और परिस्थितियों ने इसे आकार दिया, वहीं दूसरी ओर समझदारी से बनाए गए कानूनों और सुधारों ने
इसे मजबूत और व्यवस्थित बनाया।
इस प्रकार ब्रिटिश
संविधान विश्व के सबसे अनोखे और प्रभावशाली संविधानों में से एक है, जो आज भी लोकतांत्रिक
मूल्यों का प्रतीक बना हुआ है। आशा हैं कि हमारे द्वारा
दी गयी जानकारी आपको काफी पसंद आई होगी। यदि जानकारी आपको पसन्द आयी हो तो इसे
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