भारतीय राष्ट्रवादी इतिहास लेखन

भारतीय राष्ट्रवादी इतिहास लेखन

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों और इतिहासकारों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया है क्योंकि इनमें से कई राष्ट्रवादी और कुछ मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे। परन्तु कैम्ब्रिज स्कूल के इतिहासकारों ने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक पृथक् दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने अपने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन से सम्बन्धित विचारों का अग्र प्रकार से प्रस्तुत किया है।

राष्ट्रवादी इतिहासकार (Nationalist Historians) भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के क्षेत्र में दो प्रसिद्ध लेखकों डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार और डॉ. ताराचन्द्र ने अपने-अपने ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन किया है। निःसन्देह दोनों विद्वानों ने राष्ट्रीय आन्दोलन का अपने-अपने ढंग से प्रमाणिक वर्णन प्रस्तुत किया है परन्तु फिर भी दोनों की विषयवस्तु और व्याख्या में परस्पर मतान्तर पूर्णतया स्पष्ट दिखायी देता है।

डॉ. मजूमदार द्वारा लिखित इतिहास सभी पाठकों के लिए उपयोगी कहा जा सकता है जबकि ताराचन्द्र ने अपनी कृति को निरपेक्ष स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि, उनका ज्ञान सीमा के अन्तर्गत है और बाद के इतिहासकार अपने शोध के द्वारा नये तथ्यों के प्रकाश में राष्ट्रीय आन्दोलन से सम्बन्धित विचारधारा को संशोधित व परिवर्धित करने में सक्षम हो सकते हैं।

सर्वप्रथम 1952 ई. में भारतीय स्वातन्त्र्य आन्दोलन का इतिहास लेखन का दायित्व भारत सरकार ने डॉ. मजूमदार को सौंपा। उन्हें इस लेखन योजना का निदेशक बनाया गया किन्तु कतिपय कारणोंवश सरकार ने उनके द्वारा लिखित इतिहास के प्रथम भाग को स्वीकृत नहीं किया। मजूमदार के कथनानुसार उसके वर्णन के अनुसार, बंगाल का स्वरूप बड़ा दिखाई पड़ने के कारण उन्हें निदेशक के पद से हटा दिया गया था और 1955 ई. में इस पद पर डॉ. ताराचन्द्र की नियुक्ति की गयी थी। कालान्तर में डॉ. मजूमदार ने अपने द्वारा लिखित पुस्तक को स्वयं प्रकाशित करवाया। जबकि डॉ. ताराचन्द्र द्वारा लिखित पुस्तक का प्रकाशन सरकार द्वारा कराया गया था। दोनों पुस्तकों की विषयवस्तु के प्रस्तुतीकरण और तथ्यों की व्याख्या में पर्याप्त अन्तर देखने को मिलता है।

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भारतीय राष्ट्रवादी इतिहास लेखन

एक विद्वान ने स्पष्ट लिखा है कि, "ताराचन्द्र का दृष्टिकोण द्वन्द्वात्मक है-अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारतीय समाज की स्थिति (थीसेस) ब्रिटिश शासन (एण्टीथिसेस) और स्वातन्त्र्य-आन्दोलन (सिन्थेसिस) का प्रतिरूप थी।" डॉ. मजूमदार ने इस प्रतिरूप से सहमति प्रकट न करते हुए अपने विचार के अनुरूप स्वातन्त्र्य आन्दोलन की राजनीतिक व्याख्या की है।

फिर भी सूक्ष्म रूप से अध्ययन के फलस्वरूप दोनों ख्याति प्राप्त इतिहासकारों के दृष्टिकोण में कुछ समानताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती हैं। दोनों इतिहासविदों की मान्यता है कि भारतीय राष्ट्रवाद ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति की उपज है। साम्राज्यवादी इतिहासकार हबर्ट रिजले, वैलेन्टाइन शिरोल, जॉन स्ट्रेची व विन्सेण्ट स्मिथ ने भी इसी प्रकार का वर्णन किया है। दोनों प्रसिद्ध लेखक यह स्वीकार करते हैं कि भारत में राष्ट्रवाद की भावना का उदय अंग्रेजों के काल में ही हुआ था। इससे पूर्व के वर्णन में भारतीय राष्ट्रवाद का कोई उल्लेख नहीं मिलता है कि किन्तु 1857 ई.की घटना के सम्बन्ध में दोनों इतिहासकारों का वर्णन परस्पर विरोधी है। ताराचन्द्र इस घटना को 'राष्ट्रीय विप्लव' का नाम देते हैं परन्तु मजूमदार इसे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को प्रथम महान चुनौती के रूप में वर्णित करते हैं।

प्रथम लेखक के अनुसार इसका प्रमुख उद्देश्य पुरातन में खोई हुई प्रतिष्ठा का फिर से स्थापित करना था परन्तु द्वितीय इसे न तो प्रथम, न राष्ट्रीय और न ही स्वातन्त्र्य युद्ध मानते हैं। जहाँ डॉ. ताराचन्द्र ने कांग्रेस की स्थापना को भारत के इतिहास की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में वर्णित किया, वहाँ डॉ. मजूमदार ने अनमने मन से इस घटना को कोई विशेष महत्त्व न देते हुए इसका वर्णन अत्यन्त संक्षेप में प्रस्तुत किया है।

साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में भी दोनों इतिहासकारों का वर्णन भी परस्पर विरोधी दृष्टि को प्रस्तुत करता है। जहाँ मजूमदार हिन्दू और मुसलमान को दो विरोधी जातियों के रूप में वर्णित करता है, वहीं डॉ. ताराचन्द ने लिखा है कि, दोनों मिश्रित संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। मजूमदार के अनुसार, मुसलमानों ने अपनी विशिष्टता को बनाये रखने के लिये अपने-आपको भारतीय राजनीति की मुख्य धारा से संयुक्त नहीं किया और अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व के माध्यम से राष्ट्रवाद की जड़ पर प्रहार किया।

डॉ. ताराचन्द्र का यह भी कथन है कि, अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व हिन्दूओं और मुसलमानों को अलग-अलग सम्प्रदाय के लोगों के रूप में नहीं देखा जाता था। वे ही वास्तव में दो पृथक् धार्मिक सम्प्रदायों की भावना के जनक थे।

उनकी यह भी मान्यता है कि अंग्रेज ही सच्चे अर्थों में भारत में पृथक् निर्वाचन पद्धति की स्थापना के लिए भी उत्तरदायी कहे जा सकते हैं क्योंकि उन्होंने ही मुसलमानों को इस माँग के लिए प्रेरित किया थ। उनकी प्रेरणा के परिणामस्वरूप ही मुसलमान अंग्रेजों के समर्थक और हिन्दुओं के विरोधी समझे गये। अंग्रेजों ने भारत में अपने शासक को सुदृढ़ता प्रदान करने के उद्देश्य से 'फूट डालो और शासन करो' की नीति का अवलम्बन किया, जिसकी डॉ. ताराचन्द्र ने कटु आलोचना की है। साथ ही वे जिन्ना के उत्थान के लिए कांग्रेस को उत्तरदायी मानते हुए भी उसे एक धर्मनिरपेक्ष संस्था के रूप में मान्यता प्रदान करते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक में हिन्दू और मुसलमान दोनों की भर्त्सना की है क्योंकि हिन्दू अन्ध देशभक्ति में लिप्त थे और मुसलमान अपनी राष्ट्रीय समस्या के प्रति संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण उन्हें बेहतर रूप प्रदान नहीं करते थे। इकबाल और जिन्ना की कटु आलोचना करते हुए उन्होंने प्रथम को अब्बल दर्जे का सम्प्रदायवादी' और द्वितीय को दम्भी, अक्खड़ एवं अदम्य' लिखा है। पाकिस्तान के जन्म के सम्बन्ध में भी दोनों विद्वानो का दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न है। डॉ. मजूमदार पाकिस्तान के जन्म को इतिहास संगत स्वीकार करते हैं परन्तु डॉ. ताराचन्द्र के अनुसार, पाकिस्तान के उद्भव को 'निर्दयी भाग्य' से सम्बद्ध मानते हैं।

डॉ. मजूमदार की मान्यता है कि गाँधीजी, सुभाषचन्द्र बोस और मुहम्मद जिन्ना जैसे नेताओं ने स्वतन्त्रता संग्राम एवं भारत की राजनीति को विशेष रूप से प्रभावित किया था। परन्तु उन्होंने अपनी पुस्तक में कई स्थान पर गाँधीजी की आलोचना भी की है। वह गाँधीजी को भारतीय राष्ट्रवाद का जनक' नहीं मानते अपितु उन्हें राजनीतिक दृष्टि से एक दुर्बल व्यक्ति लिखते हैं। तत्कालीन राजनीति पर प्रभाव की दृष्टि से वे जवाहरलाल नेहरू के सम्बन्ध में मूक हैं। उनके अनुसार, भारतीय राष्ट्रवाद के जनक की उपाधि सरलता से सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को दी जा सकती है।

डॉ. मजूमदार ने गाँधीजी को देश की एकता की स्थापना में असफल बताया है। इसका कारण मुख्य रूप से यह है कि गाँधीजी द्वारा चलाये गये आन्दोलन समय से पूर्व ही अपनी महत्ता को खोने लगे और उनका अहिंसा का सिद्धान्त भी अधिक समय तक लोकप्रियता अर्जित नहीं कर सका। अत: उनके सहयोगियों ने ही उनके आदर्शों को मानने से इन्कार कर दिया। गाँधीजी की गतिविधियों के कारण अंग्रेज भारत के प्रबल शत्रु बन गये। उनके कारण ही कांग्रेस का स्वरूप उत्तरोत्तर साम्राज्यवादी बनता गया जिसके फलस्वरूप मुस्लिम लीग की सौदेबाजी की शक्ति में वृद्धि होने लगी। गाँधीजी ने तर्क के स्थान पर भावना को महत्त्व प्रदान किया परन्तु देश के प्रति उनका सबसे बड़ा उपकार साम्प्रदायिक समस्याओं को हल करना है।

गाँधीजी के सम्बन्ध में मजूमदार के ठीक विरोधी मत डॉ. ताराचन्द्र का है। वे गाँधीजी की भारतीय इतिहास में भूमिका को महत्त्वपूर्ण व क्रान्तिकारी मानते हैं। मजूमदार भारत में स्वाधीनता की स्थापना का श्रेय तत्कालीन परिस्थितियों और भारतीय सेना के असन्तोष को देते हैं, परन्तु ताराचन्द्र की मान्यता है कि यदि गाँधीजी का राजनीति में प्रवेश न होता तब निश्चय ही वस्तुस्थिति कुछ और होती।

अन्त में हम यह कह सकते हैं कि जहाँ मजूमदार ने केवल मुख्य राजनीतिक बिन्दुओं की ओर ध्यान दिया और सामाजिक व आर्थिक संकटों को नकार दिया, वहीं ताराचन्द्र ने राजनीतिक घटना के साथ-साथ सामाजिक व अन्य पहलुओं पर भी चिन्तन करके गाँधीजी की छवि को आदर्श रूप प्रदान किया। वास्तव में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति डॉ. ताराचन्द का दृष्टिकोण पूरी तरह उदारवादी है जबकि डॉ. मजूमदार का उग्रवादी है क्योंकि उन्होंने अपने लेखन में बंगाल को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया और यहाँ की परिस्थितियों को भारतीय राष्ट्रवाद के उदय और विकास में पूर्णतया सहायक व उत्तरदायी बताया है।

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