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क्या इतिहास में भविष्यवाणी की जा सकती है?

कुछ विद्वानों के अनुसार विज्ञान भविष्यवाणी करता है परन्तु इतिहास भविष्यवाणी नहीं करता। यद्यपि इतिहासकार यह जानता है कि अतीतकाल में घटनाओं के मध्य एक नियमितता रही है, परन्तु इसके आधार पर वह यह बताना अपना कर्त्तव्य नहीं मानता कि भविष्य में भी इस प्रकार की नियमितताएँ एक बार फिर रहेंगी। इसका कारण यह है कि भविष्यवाणी करना इतिहासकार का दायित्व नहीं होता तथा यह उसके सामर्थ्य के अन्तर्गत नहीं है।

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इतिहास में भविष्यवाणी

इतिहास का एकमात्र अभिप्राय अतीतकालिक मानवीय कार्यों का अध्ययन होता है। इतिहासकार का कार्य केवल यह है कि मानव समाज के अतीतकालीन अनुभवों के ज्ञान को समाज के उपयोग के लिए उपलब्ध करा दे। इतिहासकार की रुचि व्यक्तिगत या सामाजिक घटना में रहती है। वह से बात को जानना चाहता है जो हो चुकी है, उस घटना को समझना चाहता है जो घटित हो चुकी है।

दूसरी ओर विज्ञान व्यक्ति से भिन्न भौतिक पदार्थों तथा प्रक्रियाओं से सम्बन्धित है। वह सदा के लिए सामान्यीकरण करता है जिसकी नकल बाद में घटने वाली प्रत्येक व्यक्तिगत घटना द्वारा की जाती है।

इतिहासकार भविष्यवाणी नहीं कर सकता-

इतिहासकार भविष्य के बारे में पूर्व कल्पना नहीं करना चाहता। वह भविष्यवाणी नहीं कर सकता। विज्ञान में बिना प्रयोगों अथवा बिना भविष्यवाणियों के कोई वैज्ञानिक ज्ञान नहीं हो सकता। इसके विपरीत प्रयोगों पर आधारित कोई ऐतिहासिक ज्ञान नहीं होता।

रेनियर ने लिखा है कि इतिहास उसका पुनः उल्लेख है जो एक बार हो चुका है तथा वह इस विषय में पूर्णत: उदासीन रहता है कि अतीत की घटनाएँ पुनः घटित होंगी। वैज्ञानिक की रुचि भविष्य में रहती है। वह उसे जानना चाहता है जो पुनः घटित होना चाहिए।

कारण-कार्य के सम्बन्ध को स्वीकार करने के फलस्वरूप यदि किसी घटना के लिए उत्तरदायी सभी परिस्थितियाँ स्वयं को दोहराती हैं, तो वह घटना भी अपने आपको दोहरायेगी और यदि इस पुनरावृत्ति का निरीक्षण किया जा सकता है, तो इसके परिणामों की भविष्यवाणी भी सुरक्षित रूप से की जा सकती है। परन्तु प्रत्येक कम महत्त्व की घटनाओं का एक क्रम है और हम पूर्ण रूप से निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि वे सभी घटनाएँ दूसरी बार पुनः घटित होंगी।

परिस्थितियों की पूर्णरूप से आवृत्ति होना एक असम्भव बात है। यह अपने आप में विरोधाभासपूर्ण है। जो घटनाएँ पहले घटित हो चुकी हैं, वे बाद में घटने वाली घटनाओं को अवश्य प्रभावित करेंगी। इसलिए उनकी प्रकृति बाद की घटनाओं से अलग होगी। अत: इतिहास स्वयं को दोहरा नहीं सकता।

स्क्रीवेन का कथन है कि "इतिहासकार भविष्यवक्ता नहीं है और न उससे भविष्यवाणी की अपेक्षा करनी चाहिए। इतिहास में सार्वभौमिक परिकल्पना सम्भव है, भविष्यवाणी नहीं। किसी भूकम्प की भविष्यवाणी तो मूर्खता है और उसके विनाशकारी प्रभाव की कल्पना उपहासास्पद है। इतिहासकार का कार्य अतीत की घटना तथा उसके प्रभाव की व्याख्या है। भावी घटना की परिकल्पना इतिहास-क्षेत्र के बाहर है। भविष्यवाणी से अभिप्राय घटना का पूर्वाभास करना होता है। इतिहासकार का कार्य घटना का पूर्वाभास नहीं होता है क्योंकि वह अतीत का अध्ययन करता है, भविष्य का नहीं।"

डच इतिहासकार ब्लाक ने लिखा है कि "ज्ञान, अतीत का विस्तृत ज्ञान, हम इतिहासकारों को कल अथवा एक दिन बाद जो कुछ होगा, उस विषय में सही भविष्यवाणी करने की क्षमता नहीं देता, परन्तु यह वर्तमान को अच्छी प्रकार समझने में सहायता कर सकता है और वर्तमान की अच्छी समझ इस वर्तमान के साथ उन चीजों की दृष्टि से जिनको भविष्य हमारे लिए लायेगा, अच्छा व्यवहार करने की श्रेष्ठ गारन्टी है।"

प्रो. ई. एच. कार का विचार है कि इतिहासकार का सम्बन्ध भविष्य से भी होता है। अतीत और भविष्य एक ही समय विस्तार के दो भाग हैं। अतीत में रुचि लेने के साथ भविष्य में रुचि लेना जुड़ा हुआ है। इतिहास परम्पराओं को आगे बढ़ाते जाने में सार्थक होता है और परम्परा का अर्थ है- अतीत के पाठ और आदतें भविष्य में ले जाना। प्रो. कार ने यह भी लिखा है कि "अच्छे इतिहासकारों की हड्डियों में भी भविष्य होता है, भले ही वे इसके बारे में सोचें या न सोचें।"

इतिहास में भविष्य-कथन की भूमिका-

डॉ. गिरिजाशंकर प्रसाद मिश्र ने लिखा हैकि "इतिहास में भविष्यवाणी की सम्भावना मानने के दो उपाय हैं- चक्रात्मक तथा रेखीय। पहले की यह मान्यता है कि समाजों का उद्भव तथा पतन होता है तथा अन्य सभ्यताएँ इनके स्थान पर आती हैं और उनमें भी इसी प्रतिमान का अनुसरण होता है। दूसरे मत के अनुसार अतीत की समाष्टि प्रगति की एक सीधी रेखा में प्रवर्तित हो रही है। कार इस दूसरे मत में विश्वास करते हैं।"

ई.एच.कार ने लिखा है कि "अतीत भविष्य पर प्रकाश डालता है और भविष्य अतीत पर। यह तथ्य एक साथ इतिहास की व्याख्या भी है और उसका औचित्य भी निर्धारित करता है।" इतिहासकारों की अपेक्षा, जिनके दृष्टिकोण उनके वर्तमान और तात्कालिक स्थितियों द्वारा पूरी तौर से आबद्ध होते हैं, अपनी दृष्टि को भविष्य में इस तरह से प्रक्षेपित करने की क्षमता है कि उसे अतीत के बारे में अन्य इतिहासकारों से कहीं गहरी तथा अपेक्षाकृत स्थायी अन्तर्दृष्टि प्राप्त हो सके। आज का कोई भी इतिहासकार की व्याख्या, प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण उसकी चुनाव क्षमता, नए लक्ष्यों के क्रमिक उभार के साथ विकसित होती है। इतिहासकार में हमारा दृष्टिकोण हमारे सामाजिक दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करता है। आधुनिक संस्कृति भविष्य के प्रति आशा व इतिहास के प्रति श्रद्धा प्रकट करती है।

डॉ. गिरिजाशंकर प्रसाद मिश्र ने लिखा है कि "आधुनिक युग में प्रायः सभी प्रकार के मनुष्यों में यह विश्वास समान रूप से प्रचलित रहा है कि ऐतिहासिक विकास एक विमुक्तकारी प्रक्रिया है। वर्तमानयुगीन संस्कृति में तर्कशीलता में उतना विश्वास नहीं है, जितनी कि इतिहास में श्रद्धा है। आधुनिक संस्कृति का मुख्य स्वर भविष्य के प्रति आशावादिता का था। भविष्य में मनुष्य का उद्धार निश्चित माना गया। वस्तुतः भविष्य के द्वारा यह विश्वास दिलाया गया।"

ऐतिहासिक नियमितता के कारण-

इतिहास की घटनाओं में हमें जो नियमितता दिखाई देती है तथा जिसका सम्बन्ध प्रत्यक्षतः ऐतिहासिक नियमों एवं भविष्यवाणियों से रहता है, वह कुछ निश्चित कारणों का परिणाम है। ऐतिहासिक नियमितता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) जीवन तर्कपूर्ण है-

जब हम यह मानते हैं कि मानवीय अतीत की घटनाओं में नियमितता होती है तथा इतिहासकार जिसका प्रयोग अपनी कहानी कहने के साधन के रूप में कर सकता है, तो इससे यह बात स्पष्ट होती है कि इतिहासकार की दुनिया अर्थात् मानवीय अतीत को तर्कपूर्ण रूप से समझा जा सकता है तथा यह तर्कसंगत है। विश्व ज्ञान की विषयवस्तु है क्योंकि मस्तिष्क इसी दुनिया में विकसित हुआ है। इसकी संरचना विश्व की संरचना के अनुरूप ही विकसित हुई है जिसमें यह रहता है। यही बात प्रकृति की भाँति मानव-विश्व पर भी लागू होती है क्योंकि यह भी प्रकृति का अंग है।

यह तर्कसंगत होने का परिणाम है कि मानव जाति एक रूप संरूप (Model) पर बनी हुई है। इसलिए इसे बुद्धि द्वारा समझा जा सकता है। मानवीय अतीत केवल एक निरर्थक परिवर्तन नहीं है। इसमें एक नियमितता है जो अराजकता की स्थिति में भी रहती है। विश्व में नमनीयता का नियम कार्य करता है। विश्व की चीजें जैसी हैं, वैसी हैं।

(2) परिवर्तन का नियम-

जब इतिहासकार मानवीय अतीत के अनुभव के एक भाग की कहानी कहता है, तो वह अपने आप से एक प्रश्न पूछता है कि क्या मानव जीवन की कोई एक ऐसी विशेषता है जो इसे मूलभूत संरचना प्रदान करती हो। यद्यपि सब कुछ परिवर्तनशील है, प्रत्येक चीज हर क्षण परिवर्तित हो रही है, फिर भी इस परिवर्तनशील जगत् में ऐसा कुछ है जो सामान्य है, स्थायी है तथा बदलता नहीं है। परिवर्तनशील जगत् रथ के चक्र की भाँति निरन्तर गतिमान है, परन्तु इसकी एक धुरी है, जो स्थिर है तथा इस स्थिरता के कारण ही चक्र की गति सम्भव है। इसके अतिरिक्त गति या परिवर्तन की निरन्तरता में भी एक नियमितता है।

विश्व के पदार्थ अपना रूप बदलते रहते हैं, परन्तु स्वयं पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता। रूप बदलता है, पदार्थ बना रहता है परन्तु यह वास्तविक मूल तत्त्व इतना अनिश्चित है कि इसके वर्णन की दृष्टि से कुछ नहीं कहा जा सकता है। यह परिवर्तन के विषय के रूप में अस्तित्व रखता है तथा केवल परिवर्तन की प्रक्रिया में ही पकड़ा जा सकता है। हम इस परिवर्तनशील ब्रह्माण्ड या प्रकृति के विषय में केवल तभी सोच सकते हैं जबकि इसे समझने योग्य मानें और तब हम परिवर्तन के नियमों की रचना कर सकते हैं जो भौतिक संसार, जैविक संसार तथा मानव समाजों के विश्वास पर लागू हो सकें।

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