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मार्क्स के इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या

कार्ल मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद

कार्ल मार्क्स का संक्षिप्त परिचय-

कार्ल हेनरिक मार्क्स जर्मनी का एक प्रसिद्ध इतिहास-दार्शनिक था। उसका जन्म 1818 ई. में जर्मनी के एक यहूदी परिवार में हुआ था। उसकी प्रारम्भिक शिक्षा वोन तथा बर्लिन में हुई थी। जब मार्क्स इंग्लैण्ड में अध्ययन कर रहा था, उसकी रुचि इतिहास तथा दर्शन के प्रति हुई। 1843 ई में मार्क्स पेरिस गया जहाँ वह समाजवादी विचारकों के सम्पर्क में आया। मार्क्स पर इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति, फ्रांस की राज्य क्रान्ति तथा जर्मनी की बौद्धिक क्रान्ति का काफी प्रभाव पड़ा। वह जीवन-पर्यन्त सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर विचार-विमर्श करता रहा। उसने एंगिल्स के साथ अनेक ग्रन्थों की रचना की। उसकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं- (1) दी जर्मन आइडियालाजी, (2) दी पावर्टी ऑफ फिलासफी, (3) दी कम्यूनिस्ट मैनिफैस्टो, (4) दास कैपिटल।

कार्ल मार्क्स का चिन्तन दार्शनिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है। मार्क्स ने जो समाजवादी चिन्तन प्रस्तुत किया, वह इतिहास-अध्ययन पर आधारित है। इसके अतिरिक्त मार्क्स का दर्शन विराट एवं सुसम्बद्ध भी है। इस संदर्भ में केटलिन ने लिखा है कि "मार्क्स का क्रान्तिकारी कदम वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त पर निर्मित है। वर्ग-संघर्ष अतिरिक्त मूल्य के आर्थिक सिद्धान्त पर, आर्थिक सिद्धान्त इतिहास की आर्थिक व्याख्या पर तथा यह व्याख्या मार्क्स, हीगेल के द्वन्द्ववाद पर तथा द्वन्द्ववाद भौतिकवादी अध्यात्म विधा पर आधारित है।"

मार्क्स की दार्शनिक विचारधारा की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1. द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद-

मार्क्स एक भौतिकवादी विचारक था। अत: उसने हीगेल के आदर्शवाद की उपेक्षा करते हुए द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का समर्थन किया। उसकी मान्यता है कि विचार नहीं, वरन् भौतिक पदार्थ जगत् का आधार है। इस प्रकार मार्क्स का भौतिकवाद द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है जो प्रकृति और समाज के अन्तर्द्वन्द्व के कारण परिणामी मानता है। इस संदर्भ में सेबाइन ने लिखा है कि "हीगेल के विचारों में द्वन्द्वात्मक चिन्तन शीर्षासन कर रहा था। मार्क्स ने आदर्शवादी भ्रान्तियाँ दूर कर उसे प्राकृतिक स्थिति में पैरों के बल खड़ा किया।" इस बात को स्वयं मार्क्स ने भी स्वीकार किया है कि "उसका द्वन्द्ववाद हीगेल से न केवल भिन्न है, अपितु ठीक उसका उलटा है।"

मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(1) मार्क्स के अनुसार प्रकृति का प्रत्येक पदार्थ परस्पर जुड़ा हुआ है और एक-दूसरे पर निर्भर है, वह अचानक एकत्रित की गई वस्तुओं का संग्रह नहीं है।

(2) जगत् के भौतिक पदार्थ गतिहीन नहीं, वरन् गतिशील है। संसार में धूलकण से लेकर सूर्य पिण्ड तक सभी पदार्थों में परिवर्तन होता रहता है और ये परिवर्तन प्रकृति में नित्य-प्रति द्वन्द्व के कारण होते हैं। इन्हीं परिवर्तनों के कारण प्रगति होती है। इस क्रम में नये पदार्थों का निर्माण और पुराने पदार्थों का विकास होता है। मार्क्स के इस द्वन्द्ववाद से जगत् के जैविक अध्ययन के साथ-साथ जीवन की गतिशीलता का भी अध्ययन होता है।

(3) जगत् में यह परिवर्तन मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों प्रकार के होते हैं।

(4) जगत् की प्रत्येक वस्तु में आन्तरिक अन्तर्विरोध निहित रहता है, जिसमें सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों पक्ष होते हैं और जिनके मध्य में निरन्तर द्वन्द्व या संघर्ष चलता रहता है। इससे पुराने तत्त्व मिटते रहते हैं और नये तत्त्व उत्पन्न होते रहते हैं। इस द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के माध्यम से मार्क्स ने यह प्रमाणित करना चाहा है कि किस प्रकार पूँजीवाद के बाद समाजवादी समाज की रचना होगी।

यदि हीगेल ने इतिहास का प्रारूप दर्शन में पाया था, तो मार्क्स ने उसकी कुंजी आर्थिक परिवर्तनों में ढूँढ़ी है। प्रत्येक अवस्था में एक अन्तर्द्वन्द्व रहता है। एक वर्ग उत्पादन में परिश्रम करता है तथा दूसरा साधन-सम्पन्नता के कारण अतिरिक्त फल का उपभोग करता है। सभी ऐतिहासिक समाज इस श्रमिक और धनिक वर्ग के द्वैत को अपने अन्तर्गत लिए होने के कारण साधनों के विकसित होने पर संघर्ष और क्रान्ति से नष्ट हुए हैं। अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। उत्पीड़क तथा उत्पीड़ित सदा एक विरोधी स्थिति में रहे हैं और निरन्तर कभी छिपा और कभी प्रकट, युद्ध करते रहे हैं जिसका अन्त कभी समाज के क्रान्तिकारी पुनर्गठन से हुआ, कभी दोनों वर्गों के समान विनाश से।

कार्ल मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद सिद्धान्त, मार्क्स द्वारा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या
मार्क्स के इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या

इस प्रकार द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का निरूपण वर्ग संघर्ष के इतिहास में परिणत होता है। इस इतिहास का अन्तिम चरण पूँजीवाद की उत्पत्ति है। पूँजीवाद अन्तर्द्वन्द्व से ग्रसित है और एक क्रान्ति के द्वारा साम्यवाद की भूमिका बनेगा। इसका अन्त भी क्रान्ति के द्वारा होगा मार्क्स का विश्वास था कि एक ऐसा समय आयेगा जब सम्पूर्ण विश्व में एक साम्यवादी व्यवस्था रह जायेगी और श्रमिकों के शासन की स्थापना होगी।'

इस द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के द्वारा मार्क्स ने क्रान्ति का समर्थन किया है। इसके अनुसार मात्रात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं, परन्तु गुणात्मक परिवर्तन तीव्र गति से होते हैं। इसके लिए क्रान्ति उचित है। मार्क्स ने द्वन्द्ववाद के द्वारा वर्ग-संघर्ष को अनिवार्य बताया है। आन्तरिक विरोध संघर्ष का कारण एवं विकास का मूल मंत्र है। मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का लक्ष्य ऐसे समाज की स्थापना करना है, जिसमें न कोई वर्गभेद होगा और न कोई शोषण। यह अन्तिम संवाद होगा, जिससे कोई प्रतिवाद जन्म न लेगा। इस प्रकार वर्ग हीन समाज की स्थापना होगा और वर्ग संघर्ष को द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया रुक जायेगी।

2. इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या-

कार्ल मार्क्स के अनुसार इतिहास का वास्तविक आधार उत्पादन की प्रक्रिया है, जो जीवन के लिए सरल भौतिक उत्पादन से शुरू होता है। और निरन्तर जटिल से जटिलतर होता जाता है। समाज में उत्पादन के द्वारा विभिन्न स्तर स्थिर हो जाते हैं और दर्शन, नीतिशास्त्र आदि के रूप में चेतना के जो विभिन्न रूप उभरते हैं, वे भी किसी न किसी रूप में उत्पादन की प्रणाली से प्रभावित होते हैं। मार्क्स के अनुसार सामाजिक अस्तित्व, आर्थिक संसाधनों की स्थिति एवं उत्पादन के साधनों पर निर्भर है।

मार्क्स का कथन है कि "मेरे अध्ययन ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचा दिया है कि राज्यों के रूप और न्यायिक संबंधों को न तो स्वतः समझा जा सकता है और न वे मानव-मन की सामान्य प्रगति से जीवन की भौतिक अवस्थाओं से बद्धमूल हैं।"

मार्क्स के अनुसार इतिहास के विकास में निर्णायक तत्त्व उत्पादन की शक्तियाँ हैं और समाज में मनुष्य जो कुछ भी करता है, उसका निश्चय आर्थिक अथवा भौतिक कारकों से होता है। इस प्रकार मनुष्य आर्थिक शक्तियों का दास है। इतिहास की समस्त घटनाएँ एवं मानवीय जीवन की व्याख्या भौतिक स्थितियों से होती है। भौतिक उत्पादन का तरीका ही जीवन की सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक विधियों के स्वरूप को निश्चय करता है। इसमें विविध देशों की राजनीतिक संस्थाएँ, सामाजिक व्यवस्थाएँ, व्यापार, उद्योग, कला, दर्शन, धर्म, परम्पराएँ व रीति-रिवाज आदि भौतिक अवस्थाओं द्वारा रूप ग्रहण करते हैं।

इन भौतिक अवस्थाओं में उत्पादन, वितरण, विनिमय के ढंग व संबंधों के परिणामस्वरूप मनुष्य आर्थिक वर्गों में बँटे रहते हैं; जैसे- प्राचीन यूनान में स्वतंत्र नागरिक व दास, रोम में पेट्रीशियन व प्लीबियन, मध्य युग में भूमिपति व दास-किसान तथा वर्तमान युग में पूँजीपति व मजदूर इन दो विरोधी वर्गों के संघर्ष में मानव-इतिहास आगे बढ़ता है। दो वर्गों के मध्य वाद और प्रतिवाद की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और संवाद के रूप में नया वर्ग जन्म लेता है। यह प्रक्रिया द्वन्द्वात्मक है, जिसके पीछे आर्थिक शक्तियाँ गतिशील रहती हैं। मार्क्स के अनुसार सामाजिक और राजनीतिक क्रान्तियाँ उत्पादन और वितरण के तरीकों में परिवर्तन के कारण होती हैं। क्रान्तियों के कारण संबंधित युग की आर्थिक व्यवस्था में पाए जाते हैं, उसके चिन्तन और दर्शन में नहीं।

मार्क्स के इस सिद्धान्त का विवेचन इन बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(1) भोजन की आवश्यकता- मार्क्स की यह मान्यता है कि मनुष्य को जीवन के लिए भोजन की आवश्यकता है। अत: उसके जीवन की आधारशिला संसाधन एवं उत्पादन है। संसाधन प्रकृति देती है और उत्पादन मनुष्य के श्रम से होता है। इस प्रकार मानवीय क्रियाओं का आधार उसकी उत्पादन प्रणाली है।

(2) उत्पादन की शक्तियाँ- मार्क्स के अनुसार भौतिक संसाधनों की उत्पादन पद्धति के द्वारा ही आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक जीवन की समस्त प्रक्रिया निश्चित की जाती है। आर्थिक उत्पादन और वितरण पर ही जीवन की व्याख्या की जा सकती है। जब उत्पादन और वितरण की प्रणाली में परिवर्तन होता है, तब उसी के अनुरूप सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संस्थाओं में भी परिवर्तन होता है। मार्क्स ने उत्पादन की तीन शक्तियों का उल्लेख किया है- (1) प्राकृतिक संसाधन, (2) मशीन औजार एवं उत्पादन कला तथा (3) मनुष्य की मानसिक तथा नैतिक आदतें। मार्क्स के अनुसार उत्पादन की इन शक्तियों पर ही सामाजिक व राजनीतिक ढाँचा बनता है, जो मनुष्यों के पारस्परिक संबंधों को निश्चित करता है।

(3) उत्पादन की शक्तियों में परिवर्तन से सामाजिक संबंधों में परिवर्तन- कार्ल मार्क्स का कथन है कि जीवन के भौतिक संसाधनों की उत्पादन पद्धति ही सामाजिक, राजनीतिक और मौखिक जीवन को समस्त क्रिया को निर्धारित करती है। जब समाज के उत्पादन की शक्तियों परिवर्तन होता है, तब सामाजिक संबंधों में भी परिवर्तन हो जाता है। यही कारण है कि हाथ चलने वाले यन्त्रों के काल में सामन्तवादी समाज उदित होता है और भाप तथा विद्युत से चलने वाले यन्त्रों के काल में पूंजीवादी समाज का प्रादुर्भाव होता है।

(4) उत्पादन की शक्तियों का विकास द्वन्द्वात्मक ढंग से होता है- मार्क्स के अनुसार उत्पादन को शक्तियों का विकास द्वन्द्वात्मक दंग से होता है। विकास की यह स्थिति उस समय तक चलती है, जब तक कि उत्पादन श्रेष्ठ स्थिति में नहीं आ जाता। येपर का मत है कि मार्क्स का ऐतिहासिक भौतिकवाद एक आशावादी सिद्धान्त है जो मनुष्य के उत्तरोत्तर विकास में विश्वास करता है।

(5) धर्म दोषपूर्ण अर्थव्यवस्था का प्रतीक है- मार्क्स के अनुसार धर्म दोषपूर्ण अर्थव्यवस्था का प्रतीक और अफीम के समान है। इस नशे में समाज का अहित होता है। इस कारण मार्क्स ने धर्म का विरोध किया है।

(6) इतिहास की अनिवार्यता- मार्क्स का विचार है कि इतिहास के प्रवाह को मनुष्य अपने प्रयत्नों द्वारा नहीं रोक सकता, क्योंकि भौतिक शक्तियों मनुष्य के प्रयत्नों से स्वतंत्र होकर कार्य करती हैं। उत्पादन की शक्तियों के अनुरूप मानव-संबंध आकर रहेंगे।

(7) मानव-इतिहास का वर्गीकरण- कार्ल मार्क्स ने उत्पादन के संबंधों अथवा आर्थिक दशाओं के आधार पर मानव-इतिहास को पाँच युगों में बाँटा है-

(1) आदिम साम्यवाद का युग

(2) दासत्व का युग

(3) सामन्तवादी युग

(4) पूँजीवादी युग तथा

(5) समाजवादी युग।

इनमें से प्रत्येक अवस्था का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है।

प्रथम युग वर्ग-चेतना से हीन था। मनुष्य कन्द, मूल, फल आदि से जीवन-निर्वाह करता था। वह कृषि, पशुपालन आदि से अपरिचित था।

द्वितीय युग में पशुपालन का प्रारम्भ हुआ तथा पशुधन के रूप में व्यक्तिगत सम्पत्ति का उदय हुआ। पशुधन-सम्पन्न लोग स्वामी बन गए। तथा पशुरहित लोग दास कहलाए। दास-वर्ग के श्रम द्वारा जो उत्पादन होता था, उसका उपभोग स्वामी-वर्ग करने लगा। इस प्रकार समाज में वर्गभेद, शोषण, वर्ग-संघर्ष का प्रादुर्भाव हुआ।

सामन्तवादी युग में समाज सामन्तों और भूमिहीन कृषकों के दो विरोधी वर्गों के रूप में बंट गया। सामन्त बड़े-बड़े भू-खण्डों के स्वामी थे तथा उत्पादन के साधनों पर उनका स्वामित्व था। परन्तु भूमिहीन कृषकों की दशा दयनीय थी। कठोर परिश्रम करने के बाद भी उन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता था। परिणामस्वरूप वर्ग-संघर्ष का सूत्रपात हुआ।

पूँजीवादी युग में उत्पादन के समस्त साधनों पर पूँजीपतियों का अधिकार हो गया और श्रमिक वर्ग शोषण का शिकार हुआ। इस युग में पूँजीवादी अनेक कारणों से निरन्तर अधिक धनसम्पन्न और श्रमिक वर्ग निरन्तर गरीब होता चला गया। इसके कारण श्रमिक वर्ग का शोषण होता है जो एक नई क्रांति को जन्म देता है।

बुद्धप्रकाश के अनुसार "जब पूँजीपतियों की आपसी प्रतिस्पर्धा-प्रतिद्वन्द्रिता से लाभ कम होने लगा, श्रमिक-दलों के संगठन शक्तिशाली होने लगे और एक देश का दूसरे से सुरू हो गया और जब आर्थिक विधान आर्थिक विकास का सहायक न होकर बाधक हो गया, तो समाजवाद और साम्यवाद की लहर दौड़ गई तथा श्रमिकों का फिर से श्रम के साधनों पर अधिकार हो गया।"

कार्ल मार्क्स को मान्यता है कि वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था की समाप्ति और वर्गहीन समाजवादी व्यवस्था के आगमन से पूर्व एक संक्रमणकालीन युग रहेगा जिसमें श्रमजीवी वर्ग की अधिनायकता रहेगी और पूँजीपति तत्वों का पूर्ण रूप से विनाश किया जायेगा। उसके पश्चात वर्गहीन समाज को स्थापना होगी जिसें राज्य और धर्म का कोई स्थान नहीं होगा। इस समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार कार्य करेगा और अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ प्राप्त करेगा। मार्क्स के अनुसार मानव इतिहास की कुंजी वर्ग-संघर्ष है।

3. वर्ग-संघर्ष-

कार्ल मार्क्स की मान्यता है कि प्रत्येक व्यवस्था में एक अन्तर्द्वन्द्व रहता है। इसमें एक वर्ग उत्पादन में परिश्रम करता है और दूसरा साधन-सम्पन्न वर्ग अपनी सम्पन्नता के बल पर अतिरिक्त फल का उपभोग करता है। मार्क्स का यह सिद्धान्त उसके ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धान्त की उपसिद्धि है। समाज में सदैव श्रमिक व धनिक वर्ग रहे हैं। इनमें से धनिक वर्ग वह है, जिसका उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व रहा है और श्रमिक वर्ग वह है जो साधनों से वंचित, मात्र शारीरिक श्रम करने वाला होता है। धनिक वर्ग द्वारा सदैव श्रमिक वर्ग का शोषण किया जाता है। इस प्रकार समाज में शोषक और शोषित वर्ग हमेशा संघर्षरत रहे हैं। यही वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त है। यह वर्ग-संघर्ष कभी छिपा हुआ रहता है और कभी प्रकट रूप में होता रहता है।

गार्डिनर ने लिखा है कि "श्रमिक व धनिक वर्ग द्वैत को अपने अन्दर लिए होने के कारण साधनों के विकसित होने पर संघर्ष और क्रान्ति से नष्ट हुए हैं। सभी समाजों का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है।" उत्पीड़त और उत्पीड़िक सदा एक-दूसरे के विरोध की स्थिति में रहे हैं और वे निरन्तर छिपे रूप में अथवा प्रकट रूप में संघर्षरत रहे हैं। इसका अन्त कभी समाज के क्रान्तिकारी पुनर्गठन से हुआ, तो कभी दोनों वर्गों के विनाश से।'

कार्ल मार्क्स ने समाज के विवेचन में वर्ग को मुख्य इकाई माना है जिसमें दो प्रमुख वर्ग हैं- (1) साधन-सम्पन्न तथा (2) साधनहीन। इन दोनों ही वर्गों की जीवन शैली और सांस्कृतिक आदर्श भिन्न-भिन रहे हैं। दोनों वर्गों के हित परस्पर-विरोधी हैं। इन वर्गों में विरोधी हितों के कारण परस्पर संघर्ष रहता है। फलस्वरूप घटनाएँ घटित होती हैं। वास्तव में समस्त विश्व इतिहास आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के लिए विरोधी वर्गों में संघर्षरत है।

मार्क्स के अनुसार इस वर्ग-संघर्ष में साधन-सम्पन्न वर्ग ने साधनहीन वर्ग की अपेक्षा सीमित होने के कारण अपने हितों की रक्षा के लिए अनेक संस्थाओं की रचना की है, जिनमें राज्य और धर्म दो प्रमुख संस्थाएँ हैं। इनमें राज्य साधनहीन वर्ग का शोषण करने में साधन सम्पन्न वर्ग की सहायता करता है और अपनी दमनात्मक शक्ति से बहुसंख्यक साधनहीन वर्ग को शोषण के लिए बाध्य करता है। मार्क्स के अनुसार धर्म एक अफीम जैसा है। इसके नशे से प्रभावित साधनहीन वर्ग शोषण के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर पाता है। मार्क्स धर्म का विरोध करता है और उसे स्वार्थी एवं गलत अर्थव्यवस्था का प्रतीक मानता है। राज्य के विषय में मार्क्स का विचार है कि संक्रमण काल में राज्य रहेगा और श्रमिकों का अधिनायकत्व स्थापित होगा ताकि जिस साधन से सम्पन्न वर्ग ने श्रमिकों का शोषण किया था, उसी साधन से साधन-सम्पन्न पूँजीवादी तत्त्वों का विनाश किया जा सके।

मार्क्स का विचार है कि वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग दोनों को एक-दूसरे को आवश्यकता रहती है। श्रमिकों के बिना पूँजीपतियों के कारखाने बेकार हो जायेंगे तथा पूँजीपतियों के बिना श्रमिकों को कारखानों में रोजगार नहीं मिलेगा तथा वे बेरोजगार हो जायेंगे और अपना तथा अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर सकेंगे। इसके बावजूद दोनों के परस्पर-विरोधी हितों के कारण दोनों वर्गों में संघर्ष को स्थिति बनी रहती है जिसमें अन्तिम विजय श्रमिक वर्ग की ही होती है।

कार्ल मार्क्स ने पूँजीपति वर्ग को बुर्जुआ वर्ग और श्रमिक वर्ग को सर्वहारा वर्ग की संज्ञा दी है। बुर्जुआ वर्ग स्वाभाविक रूप से सर्वहारा वर्ग को कम मजदूरी देकर अधिक काम लेना चाहता है। इसके विपरीत सर्वहारा वर्ग अपने श्रम का अधिकतम उचित मूल्य प्राप्त करना चाहता है। ऐसी स्थिति में इन दोनों में वर्ग-संघर्ष स्वाभाविक है। इस द्वन्द्व में सर्वहारा वर्ग घाटे में रहता है क्योंकि श्रम नाशवान है। उसका संग्रह नहीं हो सकता। इसलिए सर्वहारावर्ग पूँजीपति के सामने झुकने और उसकी शर्तों को मानने के लिए विवश है।

मार्क्स की मान्यता है कि वर्तमान वर्ग-संघर्ष में अन्तिम विजय सर्वहारा वर्ग की होगी। उसके अनुसार पूंजीवाद का पतन अवश्यम्भावी है, उसमें विनाश के बीज निहित हैं। इसके परिणामस्वरूप पूंजीवाद का विनाश निश्चित है।

मार्क्स के अनुसार पूँजीवाद में निहित विनाश के तत्त्व इस प्रकार हैं-

(1) पूँजीपति व्यक्तिगत लाभ के लिए उत्पादन करता है और समाज के हितों की उपेक्षा करता है। इसके परिणामस्वरूप समाज की मांग तथा उत्पादित माल की मात्रा में सामंजस्य नहीं हो पाता।

(2) पूँजोपति में एकाधिकार की प्रवृत्ति होती है और वह बड़े पैमाने पर माल का उत्पादन करता है। इसके फलस्वरूप पूँजी का संचय केवल कुछ व्यक्तियों के हाथ में होने लगता है और सर्वहारा वर्ग की संख्या बढ़ जाती है।

(3) पूँजीवाद समाज में आर्थिक संकटों का जन्मदाता है। वह अधिक लाभ कमाने की आशा से माल की कृत्रिम कमी पैदा करता है, जिससे समाज में आर्थिक संकट पैदा होता है। इससे लोगों में पूँजीवाद के विरुद्ध असन्तोष उत्पन्न होता है।

(4) पूँजीवादीव्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य पूँजीपतियों के पास चला जाता है। उत्पादित माल की लागत कीमत और बाजार कीमत के बीच का अन्तर मूल्य अतिरिक्त मूल्य होता है। पूंजीपति इस अतिरिक्त मूल्य से समाज का शोषण करता है। इससे समाज में असन्तोष फैलता है जिससे श्रमिक वर्ग को पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध संगठित होने का प्रोत्साहन मिलता है।

(5) पूँजी से पूँजी बढ़ती है और उससे उत्पादन भी बढ़ता है। बढ़ते उत्पादन के लिए पूँजीपति दूसरे देशों में मण्डियों की तलाश करता है। फलतः अन्तर्राष्ट्रीय बाजार का विकास होता है। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कल-कारखानों का विकास होता है और श्रमिकों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क बढ़ता है।

इस प्रकार श्रमिक आन्दोलन राष्ट्रीय सीमाओं को तोड़कर अन्तर्राष्ट्रीय बन जाता है। इसीलिए मार्क्स ने यह नारा दिया था कि "दुनिया के मजदूरों एक हो" मार्क्स का विश्वास था कि दुनिया के समस्त मजदूर मिलकर पूँजीवाद के विरुद्ध अन्तर्राष्ट्रीय क्रान्ति का सूत्रपात करेंगे, जिससे पूँजीवाद का पतन होगा और सर्वहारा वर्ग की विजय होगी। मार्क्स का विश्वास था कि श्रमिक क्रान्ति के बाद श्रमिकों का अधिनायक तन्त्र स्थापित होगा और पूँजीपति वर्ग धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगा।

4. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त-

मार्क्स ने अपनी रचना 'दास केपिटल' में अतिरिक्त मुल्य के सिद्धान्त की विवेचना की है। मार्क्स के मतानुसार प्रत्येक वस्तु के दो प्रकार के मूल्य होते हैं- (1) उपयोग मूल्य तथा (2) विनिमय मूल्य। उपयोग मूल्य में वस्तु की उपयोगिता के आधार पर उसका मूल्य निर्धारित होता है। विनिमय मूल्य में वस्तु को खरीदने वाला विक्रेता से जिस मूल्य में उसे खरीदता है। क्रय-विक्रय की व्यवस्था में विनिमय मूल्य ही महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त एक उत्पादन मूल्य भी होता है। मार्क्स का कथन है कि "अतिरिक्त मूल्य उन दो मूल्यों का अन्तर है जिसे मजदूर पैदा करता है और जिसे वह वास्तव में पाता है।" मार्क्स की दृष्टि में अतिरिक्त मूल्य वस्तुतः श्रमिक के श्रम का ही परिणाम है।

कार्ल मार्क्स का विचार है कि पूँजीपति मजदूर को उचित पारिश्रमिक नहीं देते और न्यूनतम मजदूरी देकर उनका शोषण करते हैं। मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धान्त के अनुसार श्रमिक का श्रम ही वस्तुओं के मूल्य का वास्तविक सष्टा है। वास्तव में प्रत्येक वस्तु की कीमत श्रमिक द्वारा उस वस्तु में लाया गया श्रम है, परन्तु श्रमिक को उस कीमत का बहुत कम भाग ही दिया जाता है और पूँजीपति शेष भाग को स्वयं हड़प लेता है। अतिरिक्त मूल्य लागत और बिक्री के बीच के अन्तर का मूल्य है, जिसे मजदूर पैदा करता है और उस पर उसका हक बनता है, परन्तु वह पता नहीं है, उसे पूँजीपति हड़प लेता है। इस अतिरिक्त मूल्य पर वास्तविक हक श्रमिक का है।

5. मार्क्स का राज्य सिद्धान्त-

मार्क्स का राज्य संबंधी सिद्धान्त हीगेल से भिन्न है। हीगेल ने राज्य को सर्वोच्च संस्था माना है और इसे धरती पर ईश्वर का अवतार मानता है। परन्तु मार्क्स के अनुसार राज्य एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के दमन का मात्र एक यन्त्र है और उसका उद्देश्य वर्ग संघर्ष में सम्पन्न वर्ग की सहायता करना है। राज्य साधन-सम्पन्न वर्ग को साधन हीन वर्ग का शोषण करने और अपने हितों की रक्षा करने की शक्ति प्रदान करता है। अपने द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त के आधार पर मार्क्स ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में राज्य नहीं रहेगा और एक राज्यहीन समाज की स्थापना होगी। इसके पूर्व संक्रण काल में जब श्रमिक अधिनायकवाद स्थापित होगा, तब राज्य के सहयोग से वर्गभेद का अन्त होगा। राज्य का भी अन्त होगा तथा शक्ति का स्वतन्त्र विकास होगा।

मार्क्सवादी इतिहास-दर्शन का मूल्यांकन

मार्क्स का दर्शन काल्पनिक नहीं, व्यावहारिक है। मार्क्स के पूर्व अनेक दार्शनिक हुए, जिन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था में विद्यमान धन की विषमता पर राज्य की हस्तक्षेप की नीति की कटु आलोचना की है, परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि विषमता क्यों पैदा होती है।

वेपर का कथन है कि "मार्क्स ने सुन्दर गुलाब के फूलों की कल्पना तो की है, परन्तु गुलाब के वृक्षों के लिए कोई धरती नहीं तैयार की। इसीलिए मार्क्स पूर्व के समाजवादी दार्शनिक को 'स्वप्नलोकीय समाजवादी' कहा गया है।" परन्तु मार्क्स का समाजवादी दर्शन काल्पनिक न होकर व्यावहारिक है। मार्क्स पहला व्यावहारिक दार्शनिक है, जिसका विश्वास है कि आर्थिक शक्तियों के आधार पर ही इतिहास में अनवरत विकास हुआ है।

सी.ई.एम. जोड ने लिखा है कि "मार्क्स पहला समाजवादी लेखक है जिसके कार्य को वैज्ञानिक कहा जा सकता है। अपने वांछित समाज का यह चित्रण ही नहीं करता, वरन् वह उन परिस्थितियों का वर्णन भी करता है, जिसके माध्यम से इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।"

एल.डब्ल्यू लंकास्टर ने लिखा है कि "मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद होने के दो प्रमुख आधार हैं- पहला, यह वास्तविकता पर आधारित है, न कि कल्पना पर। दूसरे, यह पुरानी व्यवस्था को वैज्ञानिक तरीके से नहीं समझता, अपितु नवीन व्यवस्था स्थापित करने के लिए भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाता है।" मार्क्स का लक्ष्य मानववाद है। यह मानववा सामाजिक परिवर्तन से ही संभव है।

ए.जे.पी. टेलर का कथन है कि "मार्क्सवाद में सामाजिक परिवर्तन करने वाली शक्तियों की जो व्याख्या है, वह उसे वैज्ञानिकता प्रदान करती है। वास्तव में मार्क्स पहला व्यक्ति था, जिसने स्वप्नलोक में सोये समाजवाद को आन्दोलित कर उसे आगे बढ़ाया।"

लुई वाशर पैन ने लिखा है कि "मार्क्स ने समाजवाद को एक षड्यन्त्र के रूप में पाया तथा इसे एक आन्दोलन का रूप दिया। उसने इसे एक दर्शन और दिशा प्रदान की।"

मार्क्स की विचारधारा में वर्ग-संघर्ष को विशेष महत्त्व दिया गया है, जो उसके द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद व इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या पर आधारित है और ऐतिहासिक विकास में निर्णायक तत्त्व है। मार्क्स के अनुसार समाज का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। कुछ विद्वानों ने मार्क्स के वर्ग-संघर्ष की आलोचना भी की है।

कैहंट ने लिखा है कि "मार्क्स का यह विचार कि मतनुष्यों के समस्त झगड़े वर्ग-संघर्ष से उत्पन्न होते हैं तथा आम लोगों को यह विश्वास दिलाने में कि उनका दुर्भाग्य पूँजीवादी व्यवस्था के कारण है जो सर्वहारावर्ग की विजय के साथ ही समाप्त हो जायेगा, काफी महत्त्व रखता है, परन्तु एक वैज्ञानिक की धारणा के रूप में मिथ्या है।"

डॉ. गोविन्दचन्द्र पाण्डेय ने लिखा है कि "मार्क्स के आर्थिक इतिहास का महत्त्व अब उसको तथ्यात्मक उपलब्धियों में कम है, संस्थात्मक परिवर्तनों के सामाजिक संदर्भ में अध्ययन की द्वन्द्वात्मक पद्धति में अधिक।"

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