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ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ, कार्य और स्थिति

🔎 परिचय

ब्रिटेन की शासन व्यवस्था में प्रधानमंत्री का पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ही सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है तथा सम्पूर्ण प्रशासन, मंत्रिमण्डल और संसद का संचालन करता है। यही कारण है कि वर्तमान समय में कई विद्वान ब्रिटिश शासन-व्यवस्था को प्रधानमंत्री की सरकारतक कहते हैं।

यदि हम ब्रिटिश प्रधानमंत्री की स्थिति का अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि उसकी भूमिका केवल मंत्रिमण्डल के प्रमुख तक सीमित नहीं है, बल्कि वह शासन की सम्पूर्ण नीतियों का निर्धारण और संचालन भी करता है। इसी कारण विद्यार्थियों के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ, कार्य और स्थिति का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है।

अक्सर परीक्षाओं में ब्रिटिश प्रधानमंत्री की स्थिति और शक्तियों का वर्णन कीजिए तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ, कार्य और स्थिति का वर्णन कीजिए जैसे प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके साथ ही कई बार ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्य एवं शासन संचालन में उसकी भूमिका से सम्बन्धित प्रश्न भी परीक्षा में आते हैं।

ब्रिटिश शासन-व्यवस्था में प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल का निर्माण करता है, विदेश नीति का संचालन करता है, लोकसदन का नेतृत्व करता है तथा विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित करता है। इसलिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री की भूमिका आधुनिक शासन प्रणाली में अत्यन्त प्रभावशाली मानी जाती है।

इस लेख में हम विस्तार से ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ, कार्य, स्थिति एवं उसके महत्त्व का अध्ययन करेंगे।

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ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ, कार्य और स्थिति

📜ब्रिटिश प्रधानमंत्री की नियुक्ति

सैद्धान्तिक रूप से प्रधानमंत्री की नियुक्ति सम्राट् द्वारा की जाती है, लेकिन व्यवहार में लोकसदन के बहुमत दल के नेता को ही संसद प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करती है। प्रधानमंत्री के लिए संसद सदस्य होना अनिवार्य है तथा परम्परा के अनुसार उसे लोकसदन में से ही होना चाहिए, लार्ड सभा में से नहीं।

🏛️ब्रिटिश प्रधानमंत्री के अधिकार / शक्तियाँ और कार्य

ब्रिटिश प्रधानमंत्री शासन व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी होता है। वह न केवल सरकार का प्रमुख होता है, बल्कि सम्पूर्ण प्रशासनिक तंत्र का नेतृत्व भी करता है। उसकी शक्तियाँ एवं कार्य अत्यंत व्यापक होते हैं, जिन्हें निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-

ब्रिटिश प्रधानमंत्री के कार्यों एवं शक्तियों का वर्णन इस प्रकार से किया जा सकता है

(1) मंत्रिमण्डल का गठन-

प्रधानमंत्री का सबसे पहला कार्य पद ग्रहण करने के बाद मंत्रिमण्डल का गठन करना होता है। वह मंत्रियों की सूची तैयार करता है, जिसे सम्राट द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकृति दे दी जाती है। वास्तविक रूप से यह निर्णय प्रधानमंत्री ही करता है कि किसे मंत्री बनाया जाएगा और किसे मंत्रिमण्डल में स्थान दिया जाएगा।

(2) मंत्रिमण्डल का संचालन-

ब्रिटिश प्रधानमंत्री को मंत्रिमण्डल का प्रमुख मार्गदर्शक माना जाता है। वह इसकी बैठकों की अध्यक्षता करता है और इसकी कार्यप्रणाली पर उसका पूरा नियंत्रण रहता है। किसी भी महत्वपूर्ण विषय या विधेयक पर मंत्री को प्रधानमंत्री की सलाह और अनुमति लेनी होती है। यद्यपि निर्णय सामान्यतः सामूहिक रूप से लिए जाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री का मत अक्सर निर्णायक भूमिका निभाता है।

(3) मंत्रिमण्डल का पुनर्गठन-

प्रधानमंत्री को यह अधिकार प्राप्त होता है कि वह अपने मंत्रिमण्डल में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सकता है और मंत्रियों के विभागों में फेरबदल भी कर सकता है। इसी कारण हेराल्ड लास्की ने कहा है कि, “प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल का केन्द्र-बिन्दु है। वह उसके निर्माण, उसके जीवन और उसके अंत में केन्द्रीय स्थिति रखता है।

(4) मंत्रिमण्डल का अंत-

ब्रिटिश प्रधानमंत्री को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी मंत्री से त्यागपत्र मांग सकता है या मंत्रिमण्डल को भंग करने की सिफारिश सम्राट से कर सकता है। यदि प्रधानमंत्री स्वयं त्यागपत्र देता है, तो पूरे मंत्रिमण्डल का स्वतः अंत हो जाता है।

(5) विदेश नीति का संचालन-

विदेश मंत्रालय चाहे किसी के पास हो, फिर भी विदेशी मामलों के संचालन में प्रधानमंत्री की प्रमुख भूमिका रहती है। अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर प्रायः उसी के हस्ताक्षर होते हैं और महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में वह देश का प्रतिनिधित्व करता है। वह राष्ट्रमंडल देशों के साथ विचार-विमर्श के लिए बैठकों का आयोजन भी करता है।

(6) प्रशासन पर नियंत्रण-

व्यवहार में समस्त प्रशासनिक शक्तियों का संचालन प्रधानमंत्री के निर्देशन में होता है। वह विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करता है और आवश्यक निर्देश देता है। उच्च पदों जैसे राजदूत, न्यायाधीश, विभागाध्यक्ष आदि की नियुक्तियों में भी उसकी प्रमुख भूमिका होती है।

(7) मंत्रिमण्डल और सम्राट के बीच संबंध-

प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल और सम्राट के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है। वह मंत्रिमण्डल के निर्णयों को सम्राट तक पहुँचाता है और सम्राट की प्रतिक्रियाओं को मंत्रिमण्डल से साझा करता है। अब यह परंपरा बन चुकी है कि सम्राट से मिलने के लिए मंत्री को प्रधानमंत्री की सहमति आवश्यक होती है।

(8) लोकसदन का नेतृत्व-

प्रधानमंत्री लोकसदन का नेता भी होता है। वह सरकार की ओर से विधायी कार्यों का संचालन करता है। सरकारी विधेयक, बजट और अन्य महत्वपूर्ण नीतियाँ उसके निर्देशन में तैयार की जाती हैं। सदन के कार्य संचालन और कार्यक्रम निर्धारण में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

(9) आपातकालीन शक्तियाँ-

संकट की स्थिति जैसे युद्ध, आर्थिक संकट या हड़ताल के समय प्रधानमंत्री की शक्तियाँ और अधिक बढ़ जाती हैं। ऐसे समय में संसद सरकार को विशेष अधिकार प्रदान करती है, जिससे प्रधानमंत्री प्रभावी ढंग से निर्णय ले सकता है। उदाहरणत: द्वितीय महायुद्ध में चर्चिल ने न केवल युद्ध संचालन को अपने हाथ में ले लिया था, बल्कि ऐसी शक्तियों का प्रयोग किया था जो हिटलर एवं मुसोलिनी द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियों से किसी रूप से कम नहीं थी।

(10) वित्तीय नियंत्रण-

यद्यपि वित्त विभाग चांसलर ऑफ द एक्सचेकर के अधीन होता है, फिर भी बजट और कर नीति जैसे महत्वपूर्ण निर्णय प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में ही लिए जाते हैं।

(11) राष्ट्रीय नेता की भूमिका-

प्रधानमंत्री को देश के राष्ट्रीय नेता के रूप में देखा जाता है। वह जनता की आकांक्षाओं और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है तथा राष्ट्रीय एकता और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है।

प्रधानमन्त्री की स्थिति एवं महत्त्व

प्रधानमंत्री की स्थिति के बारे में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं

(1) प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल रूपी अक्ष की धुरी-

लॉर्ड मॉर्ले के अनुसार मंत्रिमण्डल में प्रधानमंत्री की भूमिका केन्द्र के समान होती है, जिसके चारों ओर पूरा मंत्रिमण्डल कार्य करता है। उनके अनुसार प्रधानमंत्री की स्थिति समकक्षों में प्रथमजैसी होती है, अर्थात वह अपने साथियों में सर्वोच्च स्थान रखता है।

(2) समकक्षों में प्रथम-

मंत्रिमण्डल और प्रधानमंत्री के संबंध में परम्परागत दृष्टिकोण यह माना जाता है कि प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों में प्रथमहोता है। लॉर्ड मॉर्ले के अनुसार, यद्यपि प्रधानमंत्री और उसके मंत्री सामान्यतः समान स्तर के माने जाते हैं और सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं, फिर भी प्रधानमंत्री की एक विशेष और प्रमुख स्थिति होती है। वह अपने सहकर्मियों में अग्रणी होता है और अपने पद पर रहते हुए इस विशेष अधिकार का प्रयोग करता है। इस विचार के समर्थन में उन्होंने निम्न तर्क दिए हैं

(i) नियुक्ति सम्बन्धी विशेष स्थिति-

मॉर्ले के अनुसार, प्रधानमंत्री का चयन संसद द्वारा किया जाता है, लेकिन व्यवहार में इसका निर्णय जनता की स्पष्ट इच्छा के विरुद्ध नहीं हो सकता। न तो उसे मनमाने ढंग से नियुक्त किया जा सकता है और न ही हटाया जा सकता है।

(ii) विदेशी मामलों में भूमिका-

सामान्यतः प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों के कार्यक्षेत्र में अधिक हस्तक्षेप नहीं करता, परन्तु विदेश मंत्री के साथ उसका निकट संपर्क रहता है। विदेश नीति से जुड़े मामलों में प्रधानमंत्री को अपेक्षाकृत अधिक जानकारी होती है और वह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(iii) मंत्रियों के चयन में स्वतंत्रता-

मॉर्ले के अनुसार प्रधानमंत्री को अपने सहयोगियों के चयन में काफी स्वतंत्रता होती है। यद्यपि कुछ परिस्थितियों में उसे राजनीतिक और संसदीय स्थिति का ध्यान रखना पड़ता है, फिर भी मंत्रिमण्डल के गठन और विभागों के वितरण का मुख्य अधिकार उसी के पास होता है।

(iv) विभागीय मतभेदों का समाधान-

प्रधानमंत्री विभिन्न विभागों के बीच उत्पन्न मतभेदों को सुलझाने का कार्य करता है। आवश्यकता पड़ने पर वह सम्राट की अनुमति से किसी मंत्री को त्यागपत्र देने के लिए भी बाध्य कर सकता है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री अपने सहयोगियों में प्रथमकी स्थिति रखता है। हालांकि आधुनिक समय में लॉर्ड मॉर्ले का समकक्षों में प्रथमवाला विचार पूर्ण रूप से उपयुक्त नहीं माना जाता है, क्योंकि आज प्रधानमंत्री की शक्ति और भूमिका पहले से कहीं अधिक व्यापक हो गई है।

(3) समकक्षों में प्रथम से अधिक-

वर्तमान दृष्टिकोण के अनुसार प्रधानमंत्री की स्थिति केवल समकक्षों में प्रथमतक सीमित नहीं है, बल्कि उससे भी अधिक मानी जाती है।

रम्जेम्योर के अनुसार, “प्रधानमंत्री को समकक्षों में प्रथम कहना भ्रमपूर्ण है। वह मंत्रिमण्डल का नेतृत्व करता है, उसे जीवंत बनाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका अंत भी कर सकता है। वह बहुमत दल का नेता होता है, उच्च अधिकारियों की नियुक्ति करता है तथा लोकसदन का नेतृत्व करता है। इन सभी कारणों से अन्य मंत्री उसकी बराबरी नहीं कर सकते।

सर विलियम हारकोर्ट ने प्रधानमंत्री को नक्षत्रों के बीच चन्द्रमाकहा है, जबकि डॉ. जैनिंग्स के अनुसार, प्रधानमंत्री केवल नक्षत्रों में चन्द्रमा नहीं, बल्कि सूर्य के समान है जिसके चारों ओर सभी नक्षत्र घूमते हैं।

(4) अधिनायक-

सर एन्थोनी ईडन, बटलर, सर एलेक डगलस-होम तथा हैरॉल्ड विल्सन जैसे नेताओं के संस्मरणों में यह विचार व्यक्त किया गया है कि ब्रिटिश शासन व्यवस्था में प्रधानमंत्री के समान शक्ति रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति नहीं होता। समय के साथ प्रधानमंत्री की शक्तियों में लगातार वृद्धि हुई है।

वर्तमान में मतदाता अक्सर राजनीतिक दलों की नीतियों की बजाय उनके नेताओं के व्यक्तित्व के आधार पर मतदान करते हैं, जिससे प्रधानमंत्री का चुनाव ही एक प्रकार से चुनाव परिणाम को प्रभावित करता है। इसी आधार पर कुछ विद्वान प्रधानमंत्री को अधिनायकतक मानते हैं।

हालाँकि यह मत पूर्णतः सही नहीं माना जा सकता, क्योंकि

(i) प्रधानमंत्री के मंत्रिमण्डल में कई प्रभावशाली मंत्री उसके प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं।

(ii) वह मंत्रिमण्डल की अनदेखी हमेशा नहीं कर सकता।

(iii) उस पर संसद, राजनीतिक दल, लोकमत, दबाव समूह और मीडिया का नियंत्रण रहता है।

(iv) उसे अगले चुनाव में हार का भय रहता है।

(v) उसकी नीतियों की खुलेआम आलोचना संभव है, जो अधिनायकवाद में नहीं होती।

(vi) उसकी शक्तियाँ संविधान द्वारा नहीं, बल्कि दल के बहुमत और नेतृत्व पर आधारित होती हैं।

(5) प्रधानमंत्री सारे संविधान की धुरी-

सर आइवर जैनिंग्स ने अपनी पुस्तक 'केबिनेट गवर्नमेंट' में लिखा है कि, "प्रधानमंत्री को सारे संविधान की धुरी कहना अधिक उपयुक्त होगा।" इसके पीछे उन्होंने निम्न तर्क दिए हैं

(i) दल का नेता-

प्रधानमंत्री सामान्यतः संसद में सबसे बड़े दल का नेता होता है, या पद ग्रहण करने के बाद अपने दल का नेता बन जाता है। वह दल का नेतृत्व प्रभावशाली ढंग से करता है और चुनावों में उसकी सफलता काफी हद तक उसके व्यक्तित्व और नेतृत्व पर निर्भर करती है।

(ii) हाउस ऑफ कॉमन्स का नेता-

प्रधानमंत्री हाउस ऑफ कॉमन्स का नेता होता है और सदन की कार्यवाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह मुख्य सचेतक के साथ मिलकर सदन का कार्यक्रम तय करता है, बहसों के लिए समय निर्धारित करता है तथा स्पीकर की सहायता से सदन में अनुशासन बनाए रखता है।

(iii) मंत्रिमण्डल का अध्यक्ष और नीति समन्वयक-

प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल की अध्यक्षता करता है और विभिन्न विभागों की नीतियों में समन्वय स्थापित करता है। इस प्रकार वह पूरे शासन तंत्र का केंद्र बिंदु बन जाता है।

❓ FAQs : अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ब्रिटिश प्रधानमंत्री कौन होता है?

ब्रिटेन में लोकसदन के बहुमत दल का नेता प्रधानमंत्री होता है। वही सरकार का वास्तविक प्रमुख माना जाता है।

2. ब्रिटिश प्रधानमंत्री की नियुक्ति कौन करता है?

सैद्धान्तिक रूप से प्रधानमंत्री की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती है, लेकिन व्यवहार में बहुमत दल के नेता को ही प्रधानमंत्री बनाया जाता है।

3. ब्रिटिश प्रधानमंत्री के प्रमुख कार्य क्या हैं?

मंत्रिमण्डल का गठन, शासन संचालन, विदेश नीति का संचालन, लोकसदन का नेतृत्व तथा वित्तीय नीतियों पर नियंत्रण प्रधानमंत्री के प्रमुख कार्य हैं।

4. मंत्रिमण्डल के निर्माण में प्रधानमंत्री की क्या भूमिका होती है?

प्रधानमंत्री ही मंत्रियों का चयन करता है तथा उनके विभाग निर्धारित करता है।

5. ब्रिटिश प्रधानमंत्री को समकक्षों में प्रथमक्यों कहा जाता है?

क्योंकि प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल के अन्य मंत्रियों के समान होते हुए भी उनसे अधिक प्रभावशाली और शक्तिशाली होता है।

6. क्या ब्रिटिश प्रधानमंत्री मंत्रिमण्डल का पुनर्गठन कर सकता है?

हाँ, प्रधानमंत्री आवश्यकता पड़ने पर मंत्रिमण्डल का पुनर्गठन कर सकता है तथा मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन कर सकता है।

7. विदेश नीति में ब्रिटिश प्रधानमंत्री की क्या भूमिका है?

प्रधानमंत्री विदेश सम्बन्धों का संचालन करता है तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और समझौतों में देश का प्रतिनिधित्व करता है।

8. क्या ब्रिटिश प्रधानमंत्री अधिनायक होता है?

नहीं, प्रधानमंत्री की शक्तियाँ व्यापक अवश्य होती हैं, लेकिन संसद, मंत्रिमण्डल, जनता और विपक्ष उसके कार्यों पर नियंत्रण रखते हैं।

9. ब्रिटिश प्रधानमंत्री को संविधान की धुरी क्यों कहा जाता है?

क्योंकि वह शासन, संसद, मंत्रिमण्डल और राजनीतिक दलों के बीच समन्वय स्थापित करता है।

10. आपातकालीन स्थिति में ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ कैसे बदलती हैं?

युद्ध, आर्थिक संकट या अन्य आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री की शक्तियाँ और अधिक बढ़ जाती हैं तथा उसे व्यापक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं।

📝 निष्कर्ष (Conclusion)

निष्कर्षतः ब्रिटिश प्रधानमंत्री ब्रिटेन की शासन-व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पद माना जाता है। मंत्रिमण्डल का गठन, शासन संचालन, विदेश नीति का संचालन तथा लोकसदन का नेतृत्व उसके प्रमुख कार्य हैं। इसी कारण ब्रिटिश प्रधानमंत्री की शक्तियाँ, कार्य और स्थिति राजनीतिक विज्ञान का अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है।

हालाँकि प्रधानमंत्री की शक्तियाँ व्यापक होती हैं, फिर भी वह संसद, मंत्रिमण्डल और जनता के प्रति उत्तरदायी रहता है। इसलिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री को शासन-व्यवस्था की वास्तविक धुरी माना जाता है।

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