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भारतीय राजनीति में नेतृत्व की भूमिका

नेतृत्व का अर्थ

सामान्य शब्दों में, नेतृत्व से आशय किसी व्यक्ति के ऐसे गुणों से है जिसके द्वारा वह समूह के उद्देश्यों एवं प्रयत्नों को एकता प्रदान करता है, सदस्यों को प्रेरणा देता है तथा उनका सफल मार्गदर्शन करता है। दूसरे शब्दों में, नेतृत्व वह क्षमता है जिसके माध्यम से नेता, अनुयायियों के एक समूह द्वारा वांछित कार्य बिना किसी दबाव से स्वेच्छापूर्वक सम्पन्न करवाता है। इस तरह नेतृत्व का अर्थ एक व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं का इस प्रकार निर्देशन करना होता है कि निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति आसानी से हो जाए। प्रशासन में नेतृत्व से तात्पर्य अधिकारी वर्ग की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से यह वर्ग संस्था के पूर्व निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अन्य लोगों की क्रियाओं को प्रभावित करता है।

नेतृत्व की परिभाषाएँ

नेतृत्व की कुछ मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

जार्ज आर. टैरी के अनुसार, "नेतृत्व ऐसे व्यक्तियों का सम्बन्ध है जिसके अन्तर्गत एक व्यक्ति अथवा नेता दूसरों से सम्बन्धित कार्यों पर स्वेच्छा के साथ-साथ कार्य करने को प्रभावित करता है, ताकि नेता द्वारा इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके।"

कून्ट्ज एवं ओ'डोनेल के अनुसार, "किसी लक्ष्य प्राप्ति हेतु सन्देशवाहन के माध्यम से व्यक्तियों को प्रभावित कर सकने की योग्यता नेतृत्व कहलाती है।"

चेस्टर आई. बर्नार्ड के अनुसार, "नेतृत्व का आशय व्यक्ति के व्यवहार के उस गुण से है, जिसके द्वारा वह अन्य लोगों को संगठित प्रयास से सम्बन्धित कार्य करने में मार्गदर्शन करता है।"

आर्डवे टीड के अनसार, “नेतृत्व गुणों का वह संयोजन है जिसके होने से कोई भी अन्य से कुछ कराने के योग्य होता है, क्योंकि मुख्यतः उसके प्रभाव द्वारा वे ऐसा करने को तत्पर हो जाते हैं।"

भारतीय राजनीति में नेतृत्व की भूमिका, Types of Leadership
भारतीय राजनीति में नेतृत्व की भूमिका

इस प्रकार नेतृत्व अधीनस्थ कर्मचारियों को सहकारी प्रयत्नों में अधिकतम योगदान के लिए अभिप्रेरित करने की प्रक्रिया है। यह वह मानवीय घटक है जो उन्हें साथ-साथ बाँधे रखता है तथा लक्ष्य प्राप्ति की ओर अभिप्रेरित करता है। दूसरे शब्दों में, नेतृत्व एक व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं को उपलब्ध परिस्थितियों में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित एवं मार्गदर्शन करने की प्रक्रिया है।

नेतृत्व की प्रमुख विशेषताएँ

नेतृत्व के अर्थ को समझने के बाद उसकी निम्नांकित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

1. समायोजनकारी घटक-

नेतृत्व एक समायोजनकारी घटक है जो सभी सदस्यों को सम्बद्ध करने वाली एक सामूहिक शक्ति है, जिसमें सभी सदस्य व्यक्ति एक साथ मिलकर कार्य नेतृत्व की करने के लिए प्रेरित करता है। यह एक ऐसी अनुशासित शक्ति है जो सम्पूर्ण इकाई को किसी लक्ष्य की दिशा में निरन्तर गतिशील बनाये रखती है।" प्रभावशाली व्यक्ति को अच्छा नेतृत्व देने के लिए मिलकर कार्य करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये।

2. अनुयायियों को एकत्रित करना-

बिना अनुयायियों के नेतृत्व की कल्पना करना कठिन है, वास्तव में, बिना समूह के नेतृत्व का कोई अस्तित्व ही नहीं है, क्योंकि नेता या नायक केवल अनुयायियों अथवा समूह पर ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। नेतृत्व का उद्देश्य अपने सभी अनुयायियों को अथवा व्यक्ति समूह को एकत्र करना तथा उन्हें किसी पूर्व-निर्धारित सामूहिक उद्देश्य के प्रति निष्ठावान बनाये रखना है।

3. सामूहिक लक्ष्य-

नेतृत्व की यह प्रकृति एवं स्वभाव है कि वह अपने अनुयायियों के प्रयत्नों को सामूहिक लक्ष्यों या उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु निर्देशित करता है। अत: नेता का कर्तव्य होता है कि वह लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर दे जिससे कि अनुयायी इन लक्ष्यों से अपने हितों को मिलाकर उन्हें पूरा करने का प्रयत्न कर सकें।

4. आचरण तथा व्यवहार को प्रभावित करना-

लोक प्रशासन में नेतृत्व की भूमिका इस आधार पर तय होती है कि कोई अधिशासी किस सीमा तक अपने सहयोगियों के आचरण अथवा व्यवहार को अपेक्षित दिशा में प्रभावित कर सकता है। अधिशासी आचरण के अनुसार कार्य अपने अधीनस्थ व्यक्तियों को निर्देशन देना तथा उन्हें एक निश्चित ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करना है जिससे उनमें विचारशील प्रतिक्रिया स्वत: जागृत हो सके।

5. पारस्परिक सम्बन्ध-

नेता वह होता है जो यह जानता है कि दूसरों की इच्छाओं को किस प्रकार अन्तः सम्बन्धित किया जाये जिससे वे साथ मिलकर कार्य करने के लिए स्वत:प्रेरित हो सकें । इस प्रकार स्वयं समूह को प्रभावित ही नहीं करता है वरन् स्वयं भी समूह द्वारा प्रभावित होता है।

6. अनुशासित शक्ति-

नेतृत्व में अनुशासित शक्ति होने के कारण सभी सदस्य अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक आदेश के तहत प्रयत्नशील रहते हैं। नेतृत्व द्वारा सदस्यों को एक विचार लक्ष्य के लिए अनुशासित रखा जाता है।

नेतृत्व के प्रकार

अनुशासित शक्ति के अधीन रहकर सदस्यगण लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इसके लिए नेतृत्व का रूप उसे प्रभावित करता है। उपर्युक्त आधार पर नेतृत्व के निम्नांकित प्रकार देखने को मिलते हैं-

1. अधिनायकवादी नेतृत्व-

इस प्रकार के नेतृत्व में अधीनस्थ अथवा सदस्य भयवश कार्य करते हैं क्योंकि नेता के आदेश की अवहेलना करना किसी अनिश्चितता का संकेत देती है। ऐसे विचारों वाला नेता अपने अधीनस्थों में दण्ड की भावना भर देता है जिससे लोगों में नौकरी छूटने, पदावनति, मजदूरी में कमी आदि का भय बना रहता है। अस्थायी उपाय के रूप में ऐसा नेतृत्व कुछ समय के लिए अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर सकता है लेकिन दीर्घकाल के लिए वह असफल हो जाता है।

2. स्वेच्छाचारी नेतृत्व-

स्वेच्छाचारी नेतृत्व अधिनायकी नेतृत्व से कुछ अर्थों में भिन्न है। ऐसा नेतृत्व अपने अधीनस्थों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए अवसर प्रदान करने के लिए तत्पर रहता है यदि उसके अधीनस्थ उसकी आवश्यकतानुसार कार्य करते हैं। परन्तु इस प्रकार के नेता सम्पूर्ण अधिकार अपने हाथ में रखते हैं तथा समस्त शक्ति एवं निर्णय लेने का अधिकार उसी में केन्द्रित होता है। इस प्रवृत्ति के नेता किसी विषय पर भी निर्णयन का अधिकार अपने अधीनस्थ अधिकारियों को नहीं देते हैं। वे अंतिम लक्ष्य एवं उद्देश्य से पूर्णतया अनभिज्ञ होते हैं।

3. स्वच्छन्दतावादी नेतृत्व-

इस प्रकार के नेतृत्व में नेता अपने अनुयायियों एवं अधीनस्थों के साथ सम्पर्क नहीं रखना चाहता और उन्हें अपने लक्ष्य निर्धारित करने तथा स्वयं निर्णय लेने के लिए अवसर प्रदान करता है। वास्तव में अधीनस्थों को पर्याप्त अधिकार सौंप दिये जाते हैं। इस प्रकार के नेता मार्गदर्शन नहीं करते हैं । इस प्रकार वह आज्ञा देने के अयोग्य होता है। सम्पूर्ण संगठन में अव्यवस्था पायी जाती है क्योंकि यह व्यक्तियों को विभिन्न दशाओं में कार्य करने की अनुमति प्रदान करता है। यह नेतृत्व विशेष परिस्थितियों में ही सफल हो सकता है।

4. राजतंत्रिकवादी नेतृत्व-

इस प्रकार का नेतृत्व बहुधा राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में देखने को मिलता है। वंश परम्परा के नियम का पालन करते हुए पिता से पुत्र को सत्ता स्वतः मिलती है अथवा हथिया ली जाती है। ये नेतृत्व प्रजा में अपना प्रभाव जमाने के लिए अधिनायकी आज्ञा को महत्त्व देते हैं।

5. लोकतांत्रिक नेतृत्व-

लोकतांत्रिक विचारों वाला नेता ऐसा व्यक्ति होता है जो कि समूह के साथ विचार-विमर्श करके नीतियों का निर्माण करता है। ऐसा नेतृत्व अवधारणा, अधिकार तथा निर्णयन के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है। ये अपने अनुयायी को एक सामाजिक इकाई के रूप में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं तथा समूह के सदस्यों की निपुणताओं एवं योग्यताओं का पूरा-पूरा लाभ उठाते हैं। ऐसा नेता अपने अधीनस्थों की आवश्यकताओं एवम् रुचियों का पूरा ध्यान रखता है तथा उनके साथ दया व निष्ठापूर्वक व्यवहार करता है। ऐसे नेता को कर्मचारी केन्द्रित नहीं वरन् कार्य केन्द्रित कहा जाता है।

भारतीय राजनीति में नेतृत्व की भूमिका

भारत की राजनीति और भारत के राजनीतिक दलों में अन्य किसी भी देश की तुलना में नेतृत्व की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण रही है, जो निम्न प्रकार से हैं-

1. भारतीय राजनीति में नेतृत्व के तत्व की अतिमहत्त्वपूर्ण स्थिति-

भारतीय राजनीति में 1950-64 के वर्षों में पं. नेहरू तथा 1971-72 के वर्षों में श्रीमती गाँधी को चमत्कारिक नेतृत्व की स्थिति प्राप्त रही है। कुछ सीमा तक भारतीय राजनीति में वाजपेयी एवं नरेन्द्र मोदी को यह स्थिति प्राप्त रही है जो वर्तमान में जारी है।

पं. नेहरू तथा उसके बाद श्रीमती गाँधी जब तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रही, भारत की समस्त राजनीति उनके व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती रही। 1984 में श्रीमती गाँधी के निधन के बाद 1985 से 1999 तक की राजनीति को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख व्यक्तित्व रहे- राजीव गाँधी, वी.पी. सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, सोनिया गाँधी और लालकृष्ण आडवाणी आदि।

1996-2004 के वर्षों का राजनीतिक सत्य और राजनीतिक असंगति यह है कि कुछ प्रादेशिक व्यक्तित्वों ने भी अपने लिए राष्ट्रीय राजनीत में महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है। 2004 से 2014 तक भारतीय राजनीति का नेतृत्व डॉ. मनमोहन सिंह सोनिया गाँधी के नेतृत्व में रहा। मई 2014 से अब तक भारतीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी का चेहरा एक नये नेतृत्व के रूप में उभरकर आया है जिसने केन्द्र में अकेले भाजपा को 282 सीटें दिलाकर भारतीय राजनीति में नेतृत्व का परचम लहराया। मई, 2019 के लोकसभा चुनावों में 303 सीटें अकेले अपने दम पर लाने में नरेन्द्र मोदी सफल रहे।

2. नेतृत्व के प्रसंग में जन-जागरूकता की स्थिति-

भारतीय राजनीति ने नेतृत्व के प्रसंग में जनता की जागरूकता का परिचय दिया है। 1975-76 में जब श्रीमती गाँधी ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं की अवहेलना की तब जनता ने श्रीमती गाँधी को उनका स्थान बतला दिया था। इसी प्रकार राजीव गाँधी की राजनीतिक भूल बर्दाश्त के बाहर हो गई, तब जनता ने सत्ता परिवर्तन का मार्ग अपना लिया। इसी प्रकार डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की कमियों के बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में दिखायी देने वाली जनजागरुकता वर्तमान स्थिति का जीता जागता उदाहरण है। इस प्रकार जनता नेतृत्व के प्रति लगाव और कुछ सीमा तक श्रद्धा रखती है, लेकिन किसी भी रूप में यह अन्ध श्रद्धा नहीं है। नेतृत्व के प्रति जनता का यह लगाव तथा उनकी यह श्रद्धा लोकतांत्रिक सीमाओं के भीतर है।

3. सामान्यतया नेतृत्व का निर्णय मतपेटी के आधार पर, लेकिन कुछ अपवाद-

भारत में अब तक 17 आम चुनाव हो चुके हैं जिनके नेतृत्व का प्रश्न का निर्माण मतपेटी के आधार पर हुआ है। भारतीय राजनीति में दो अवसर ऐसे आए जिनमें नेतृत्व के प्रश्न का निर्णय बहुत कुछ सीमा तक छलयोजित राजनीति (Manipulative Politics) के आधार पर हुआ है। 1979 में चरणसिंह और 1990 में चन्द्रशेखर द्वारा प्रधानमंत्री पद का ग्रहण छलयोजित राजनीति का उदाहरण ही कहा जा सकता है। 13वीं लोकसभा के चुनाव 1999, चौदहवीं लोकसभा के चुनाव 2004, पन्द्रहवीं लोकसभा के चुनाव 2009 तथा 16वीं लोकसभा के चुनाव 2014 में एवं 17वीं लोकसभा के चुनाव 2019 में नेतृत्व के प्रश्न का निर्णय मतपेटी के आधार पर ही हुआ है।

4. जनता के सीधे समर्थन से प्राप्त नेतृत्व ही उचित स्थिति-

वर्ष 1952, 1957, 1962, 1971, 1980,1984 और 1999, 2014 एवं 2019 की स्थितियाँ ऐसी रही जिनमें नेतृत्व की स्थिति को सम्बन्धित व्यक्ति ने अपनी ही राजनीतिक शक्ति के बलबूते पर प्राप्त किया है। 1962, 1967, 1977, 1989,1996 और 1997 की स्थितियाँ ऐसी रही है जिनमें नेतृत्व की स्थिति को अन्य व्यक्तियों के सहारे और सहयोग से प्राप्त किया गया। इस प्रसंग में भारतीय राजनीति का पाठ यह है कि जब कोई व्यक्ति नेतृत्व की स्थिति अपनी ही राजनीतिक शक्ति और जनता के सीधे समर्थन के बल पर प्राप्त करता है तो वह आत्मविश्वास के साथ कार्य करने में समर्थ होता है लेकिन जब नेतृत्व की स्थिति को अन्य तत्वों के समर्थन और सहयोग के बल पर प्राप्त करता है, तब नेतृत्व की स्थिति स्वाभाविक रूप से निर्बल हो जाती है।

5. नेतृत्व की कथनी और करनी में भेद-

नेता वर्ग और नेतृत्व की दृष्टि से जहां एक ओर भारत को भाग्यशाली कहा जाता है, वहाँ दूसरी ओर नेता वर्ग और नेतृत्व का ऋणात्मक पक्ष भी है। भारतीय नेतृत्व की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर देखा जा सकता है। नेतृत्व जितने ऊँचे स्वर में समाजवाद और लोक कल्याण की बात करता है। व्यवहार के अन्तर्गत उतने ही प्रबल रूप में पूँजीवाद का पक्ष ग्रहण किया जाता है। यही कारण है कि भूमि सुधार कानून और साधारण जनता की स्थिति में सुधार के अन्य सभी प्रयत्न कागज पर ही रह गये हैं और व्यवहार में धनी तथा गरीब का भेद कम होने की बजाय बढ़ा ही है।

गुन्नार मिंडल के अनुसार गत लगभग एक दशक से और विशेष रूप से 1999-2004 के वर्षों में केन्द्र और राज्यों में सर्वोच्च स्तर का राजनीतिक अभिजन कठिन वित्तीय स्थिति' की रट लगाए हुए था लेकिन केन्द्रीय स्तर पर या किसी भी राज्य स्तर पर राजनीतिक खर्चों और राजनीतिक रख-रखाव से जुड़े खर्चों में कमी लाने का कोई भी प्रयल नहीं किया गया। इस देश का राजनीतिज्ञ और वस्तुतः न केवल राजनीतिज्ञ वरन् देश का लगभग समस्त अभिजन एक स्थिति से सर्वाधिक परहेज करता है और वह है आत्म निरीक्षण। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में नेतृत्व की भूमिका सदैव ही बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण रही है और आगे आने वाले समय में भी नेतृत्व की भूमिका महत्त्वपूर्ण ही रहेगी।

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